बुधवार, 13 अक्तूबर 2021

पिट्सबर्ग से प्रकाशित द्वैभाषिक पत्रिका 'सेतु' के सम्पादक मंडल द्वारा सम्मानित 




 

 

     वैश्विक हिंदी संस्थन , ह्यूस्ट्न, यू एस ए  के कार्यक्रम में काव्य पाठ के लिये प्रश्स्ति पत्र प्रदान किया गया --- 




मंगलवार, 14 सितंबर 2021


भारतीय सैन्य इतिहास का सब से महत्वपूर्ण युद्ध --सारागढ़ी किले की लड़ाई
 अन्तिम साँस - अन्तिम गोली - अन्तिम सैनिक ——-ज़रा याद रहे क़ुर्बानी .

12 सितम्बर,1894 के दिन हुई सारागढ़ी की लड़ाई को सैन्य इतिहास की सबसे महान लड़ाइयों में से एक जाना जाता है | यह युद्ध में इसमें बिर्टिश फ़ौज में तैनात 36 सिक्ख रेजिमेंट के 21 सिख बहादुर सैनिकों ने छह घंटे से अधिक समय तक 10000 से भी ज़्यादा उग्र अफ्गानों के खिलाफ लड़ते हुए किले को बंद रखा और अंत में इस किले की रक्षा में सभी सैनिक शहीद हो गये | उस समय की 36 सिख रेजिमेंट आज भारतीय सेना की 4 सिख रेजिमेंट के नाम से जानी जाती है |सारगढ़ी का युद्ध जिस तरह से लड़ा गया था वो सब को हैरान कर देगा, क्योंकि
इन 21 बहादुर सैनिकों ने 10000 से ज्यादा अफ्गानों का जिस तरह सामना किया वो सैनिकों की वीरता के इतिहास में सब से महत्वपूर्ण उदाहरण है |
जब महारानी विक्टोरिया को इसकी ख़बर मिली तो उन्होंने सभी 21 सैनिकों को इंडियन ऑर्डर ऑफ़ मैरिट देने का ऐलान किया.ये उस समय तक भारतियों को मिलने वाला सबसे बड़ा वीरता पदक था जो तब के विक्टोरिया क्रॉस और आज के परमवीर चक्र के बराबर था.
सिख सैन्य कर्मियों द्वारा इस युद्ध की याद में 12 सितम्बर को सारगढ़ी दिवस के रूप में मनाते हैं।
सारागढ़ी युद्ध में शहीद होने वाले सिखों की याद में तीन गुरुद्वारों का निर्माण करवाया गया जिनमें से एक सारागढ़ी की युद्ध वाली जगह पर स्थित है और दूसरा फिरोजपुर और तीसरा अमृतसर बनाया गया है।
मुझे आप सब को बताते हुए गर्व हो रहा है कि मेरे पति जनरल केशव पाधा को फिरोजपुर में इस बहादुर 4 सिख रेजिमेंट के साथ कार्य करने का अवसर मिला| फिरोजपुर छावनी में स्थित सारागढ़ी गुरद्वारे के प्रांगन में एक विशाल स्मारक बना हुआ है जिस पर उन परमवीर सैनिकों के नाम लिखे गये हैं | हर वर्ष 12 सितम्बर को वहाँ पर उन शहीदों की याद में एक आयोजन होता है और स्मारक पर पुष्पमालाएँ अर्पित की जाती हैं |
उस ऐतिहासिक स्मारक की तस्वीर आपके साथ साझा कर रही हूँ |
* हिन्दी फिल्म 'केसरी' रोंगटे खड़े करने वाली इसी लड़ाई की याद में बनी है l
*मेरे पति जनरल केशव पाधा इन अद्भुत वीर सेनानियों के स्मारक पर उन्हें नमन करते हुए ।



शशि पाधा , 12 सितम्बर --सरगढ़ी दिवस

बुधवार, 8 सितंबर 2021

 

                  सपनों की उड़ान

                        एक संस्मरण

सपने लेना कोई बड़ी बात नहीं लेकिन उनका साकार हो जाना बड़ी बात हो जाती है । मेरे पति प्रशिक्षित पैराट्रूपर हैं | मैंने उन्हें अपनी यूनिट और साथियों के साथ कई बार  पैराछूट के सहारे जहाज से छलाँग लगाते देखा है । उनके लिए पैर जम्प कोई मनोरंजन का खेल नहीं था, यह उनका पेशा भी था । यानी वह पैराछूट रेजिमेंट की महत्वपूर्ण पलटन 9 पैरा स्पेशल फोर्सेस में एक अधिकारी के रूप में कार्यरत थे और उन्होंने 1 पैरा स्पेशल फोर्सेस की कमान भी संभाली । मैं जब भी उन्हें जहाज से छलाँग लगाते देखती, मेरे अन्दर बैठा हुआ मेरा बचपन भी वही करने को मचल उठता । मैं इनसे कई प्रश्न पूछती--- आपको डर नहीं लगता ? आपको ज़मीन कैसी दिखाई देती है? अगर पैराछूट न खुले तो ----- यानी हर छलाँग के समय नया सवाल होता था । 100 से अधिक जम्प देखते-देखते आदत सी पड़ गयी थी और अब मैंने सवाल पूछने बंद कर दिए थे| लेकिन मन में एक आस धीरे धीरे पल रही थी | काश! मैं भी हवा में उड़ सकूँ, मैं भी जम्प कर सकूँ ।

अपने सैनिक जीवन के 30 साल तक मैं इस सपने को पालती -संवारती रही । और एक दिन अचानक एक चमत्कार हो गया |

वर्ष 1997 में मेरे पति पंजाब के फिरोजपुर डिविजन के कमान अधिकारी थे । एक दिन छावनी  के आस-पास घूमते-घूमते उन्होंने एक गाँव के पास एक पुरानी हवाई पट्टी देखी।पूछने पर पता चला कि द्वितीय विश्व युद्ध के समय रॉयल एयर फ़ोर्स उड़ान भरने के लिए इस हवाई पट्टी को प्रयोग में लाती थी । विभाजन के बाद पाकिस्तान की सीमा के बहुत नज़दीक होने के कारण भारत की हवाई सेना इसका प्रयोग नहीं कर रही थी । गाँव वालों ने वहाँ अनाज के ढेर लगा रखे थे और आस-पास थोड़ी-बहुत खेती भी की जाती थी । मेरे पति को हर छावनी में कुछ कुछ सुधार करने की इच्छा रहती थी । इस हवाई पट्टी को देखते ही उन्होंने इसे प्रयोग में लाने का निर्णय लिया । कुछ दिन के बाद उस स्थान पर ‘पैरा सेलिंग स्पोर्ट्स कल्ब’ की नींव रख दी गयी ।

अंग्रेजी में एक कहावत है  The mighty oak was once just a seed ।’ उस वीरान पड़ी हवाई पट्टी की सफ़ाई और मरम्मत आरम्भ हो गयी। पैरासेलिंग के प्रशिक्षण के लिए विशेष प्रशिक्षक बुलाये गये । आरम्भ में केवल दो या तीन पैराछूट ही उपलब्ध कराये गये । इस तरह बड़े जोश और उत्साह के बाद इस क्लब की नींव रखी गयी । पूरी सैनिक छावनी में यह बात हवा की तरह फैल गई कि कुछ ही दिनों में यहाँ पैरासेलिंग एक खेल की तरह आरम्भ होने वाली है । फिरोजपुर नगर के वासियों ने युवाओं ने, सिविल अधिकारियों ने इस प्रोजेक्ट में इतनी दिलचस्पी दिखाई कि सैनिक अधिकारियों ने शीघ्र ही इसके शुभारम्भ का निर्णय ले लिया ।

अब इस पूरी कहानी में मेरी भूमिका क्या रही? न तो मैं सैनिक अधिकारी थी, न ही युवा लड़की जो इस कहानी में कोई किरदार निभा सके । मैंने कहीं बचपन में पढ़ा था --

“One Can Never Consent To Creep When One Feels An Impulse To Soar”

                                              ---- Helen Keeler

30 वर्ष तक मैं अपने पति और उनके साथ के सैनिकों को पैरा जम्प करते हुए देखती थी । अब समय भी था और अवसर भी कि मैं भी हवा में उड़ान भरूँ,एक उन्मुक्त पंछी के समान कुछ देर हवा से बातें करूँ और फिर अपने कृत्रिम पंखों के सहारे धरती पर लौट आऊँ। पर कैसे? अपने मन की बात किसी से कहने में संकोच हो रहा था ।

फ़ौज में एक बहुत अच्छी प्रथा है। जब भी कोई नया काम शुरू होता है तो उस छावनी के सब से वरिष्ठ अधिकारी या उनकी पत्नी से उसका उद्घाटन  कराया जाता है । मैं मानती हूँ कि बड़ों का आशीर्वाद लेना भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है। इसी परम्परा को निभाने के लिए इस  स्पोर्ट क्लब को भारतीय सेना और नगर को सौंपने के दिन मुझसे इसका उद्घाटन करने के लिए कहा गया| मैंने हामी भर दी |

उद्घाटन समारोह के दो दिन पहले सभी लोग तैयारी में जुटे थे | मैं भी अपने पति के साथ सब का उत्साह बढ़ाने के लिए चली गयी |एक दो जम्प भी देखे | मैं रोमांचित होकर इस करतब के विषय में वहाँ खड़े अधिकारियों से विभिन्न प्रश्न पूछने लगी | मेरी उत्सुकता देख एक अधिकारी ने बड़ी विनम्रता पूछा, “ मैम! क्या आप भी पैरासेलिंग करना चाहेंगी?” मुझे लगा कि शायद  शिष्टाचार वश वे पूछ रहे हैं | मैंने पास खड़े अपने पति की ओर देखा | उन्होंने मुस्कुरा कर कहा, “जाइए,कीजिये अपने मन की आज|”

इससे पहले कि मैं कुछ कहती प्रशिक्षकों ने मुझे तीय करना शुरू कर दिया | मुझसे कहा, “ मैम! आप एक बार किसी अन्य सैनिक को  पैरासेलिंग करते देख लें ताकि आपको पूरी टेक्नीक का पता चल जाए ।”

मेरे सैनिक पति तो बहुत खुश थे कि मैंने इस साहसिक कार्य को करने का निर्णय लिया था । सच कहूँ तो मुझे कोई भय ही नहीं था क्यूँकि मैंने बरसों तक सैनिको को पैराजम्प करते देखा था । वास्तव में अपनी पलटन में कई बार Free Fall (Skydiving) के करतब भी देखे थे । मैं शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार थी ।

मैं अपने पाठकों को पैरासेलिंग की टेक्नीक के बारे में बता दूँ । इसकी तैयारी के लिए प्रतिभागी के शरीर पर एक हार्नेस बाँध दी जाती है । उसके साथ एक मोटी रस्सी बंधी होती है जिसका दूसरा सिरा एक जीप के साथ बंधा होता है । पैरासेलर की पीठ पर एक पैराछूट बाँध दी जाती है । सुरक्षा के लिए सर पर हेलमेट और पाँव में भारी बूट पहनना आवश्यक है । पैराछूट को पीछे दो लोगों ने पकड़ा होता है । जैसे ही संकेत मिलता है, जीप चलने लगती है और खिलाड़ी को लगभग 20 -30 फुट तेज़ क़दमों से भागना होता है । जैसे ही पीछे खड़े सहायक पैराछूट छोड़ देते हैं उसमे हवा भर जाती है । खिलाड़ी को बस उसी क्षण अपने को धरती से ऊपर थोड़ा उछालना होता है । इसके बाद तो आप, हवा में,खुले आकाश में सैर कर रहे होते हैं। अब पूरा आकाश आपका । जैसे ही जीप की गति धीमी होती जाती है आप नीचे आते जाते हो । और सम्भल कर धरती पर पाँव टिका देते हो|




मैंने उस दिन बस एक जम्प देखा, उसकी पूरी तैयारी को समझा और मैं उड़ने के लिए तैयार । हार्नेस,मोटे दस्ताने- कोहनियों पर बंधी पट्टी, हेलमेट आदि सभी आवश्यक चीज़ें बाँध- पहन कर मैं हवाई पट्टी पर खड़ी हो गयी । आस-पास बहुत से लोग थे । मेरा ध्यान केवल सामने खड़ी जीप पर था कि कब स्टार्ट होगी और मुझे कब दौड़ आरम्भ करनी है । कोई डर नहीं था, कोई आशंका नहीं थी। बस, मेरे मन मस्तिष्क में एक जूनून था, उड़ने का ।

जीप चली, मैं कितनी भागी पता नहीं पर अब मैं हवा में उड़ रही थी । parachute की डोरियाँ मेरे हाथ में थीं ताकि मैं अपनी पोजीशन पर नियंत्रण रख सकूँ । वैसे तो छावनी की सब से वरिष्ठ सैनिक पत्नी को हर बात को नाप-तोल के बोलना पड़ता है लेकिन उस समय मैं स्वयं को एक छोटे से पंछी के समान समझ रही थी और सब कुछ भूल कर मैंने न जाने -क्या क्या कह रही थी। कुछ-कुछ याद है - “यह तो अद्भुत है! मैं अब धरती पर नहीं आना चाहती |




मैं हवा से बातें कर रही थी कि खुद से, नहीं जानती | लेकिन धीरे धीरे मेरे हार्नेस से बंधी रस्सी ढीली होती गयी और मैं नीची आती गयी | धरती पर पैर रखते ही मैंने स्वयं से कहा, “कौन कहता है मेरे पास पंख नहीं हैं |"

शशि पाधा

Email: shashipadha@gmail.com

 

 

 

 

 

 

मंगलवार, 31 अगस्त 2021

 

आज मन अधीर है

  ********

           

आज मन अधीर है |

काँपती कोमल धरा अब

मन में गहरी पीर है |

 

कान मेरे सुन रहे

शोर चीत्कार अब

आँख खोलूँ तो मैं देखूँ

संहार–हाहाकार अब

  शान्ति के देवता के पाँव में जंजीर है

   आज मन अधीर है |

 

हरित धरा की ओढ़नी

रक्त रंजित हो गई

आतंक के प्रहार देख

हर आँख नम हो गई

आज  विश्व के ह्रदय में बिंध गया तीर है

आज मन अधीर है |

 

संवेदना, सद्भाव क्यूँ  

मिट गये संसार से

विवश विकल खड़ा मनुज  

आतंक के प्रसार  से

 आज जन जन के नयन में वेदना का नीर है |

  मन बहुत अधीर है |

है प्रार्थना उस ईश से

कुछ तो अब निदान कर

हो अंत इस पाप का

कुछ तो समाधान कर

इन दानवों के हाथ में विनाश की तस्वीर है  

मन बहुत अधीर है

समस्या गंभीर है

मन में गहरी पीर है |

 

 

 

 

                                            मंद बयार में खनकती हँसी   --- पद्मा सचदेव

 

बात उन दिनों की है जब मैं बहुत छोटी थी | इतनी छोटी कि दो चोटियों के झूले से बना कर ऊपर रिब्बन से बाँध देती थी | मैं नहीं, मेरी दीदी बाँधती थी | अपने हमउम्र बच्चों के संग खेलते-खेलते हम ‘राजा की मंडी’ के बागों तक चले जाते थे | वहाँ संगमरमर की सीढियों से फिसलते थे और विदेश से आये फव्वारों की फुहार में भीगते थे | यह वही मुबारक मंडी है जिसे  पद्मा सचदेव जी ने अपने प्रतिनिधि गीत ‘ ए राजे दियाँ मंडियाँ तुन्दियाँ न ‘ में शब्दरूप   कर अपने रचनात्मक जीवन की प्रथम सीढ़ी पर पैर रखे थे| यह वही राजा की मंडी है जहाँ जम्मू के राज परिवार के महल थे|  पद्मा जी यह बात बड़े मजे से सुनाती हैं कि किसी दिन कोई’गलेलन’ ( गुज्जर स्त्री’) घूमती-घूमती उनके घर की डयोढ़ी पर आ बैठी | घर के पास ही राजा के महल थे | घर में इतनी सुन्दर डोगरी लड़की को देख कर उसने समझा यह अवश्य कोई राजकुमारी है | उसने  उत्सुकता वश पूछ लिया , “ क्या यह  राजा के महल आपके हैं?” उस गलेलन के भोलेपन से पद्मा जी इतनी सम्मोहित हो गईं कि इस गीत की रचना हो गई |  यह उनका सबसे पहले  लिखे गीतों में से एक है | तब वह पन्द्रह -सोलह वर्ष की थीं | बचपन में यह भी सुना  था कि छह-साथ वर्ष की पद्मा जी को बहुत से संस्कृत के श्लोक कंठस्थ थे और बहुत बार जब वह अपने विद्वान् पिता के साथ कहीं जाती तो उनसे संस्कृत के श्लोक सुनाने का आग्रह किया जाता था | यह बात मुझे अपनी बड़ी बहन ने उनके लिखे एक उपन्यास को पढ़ते हुए सुनाई थी

 

 पद्मा जी का घर राजा की मंडी से सटे हुए पंचतीर्थी मोहल्ले में था | वहीं पर विश्व प्रसिद्ध संतूरवादक पंडित शिव कुमार शर्मा जी का और हमारा घर भी था | मेरे बड़े भाई श्री प्रकाश शर्मा भी संगीत में रूचि रखते थे | इसलिए बहुत बार मोहल्ले के किसी न किसी घर में इन युवा संगीत प्रेमियों की मित्रमंडली जमा हो जाती थी और गयी रात तक गाने बजाने का कार्यक्रम चलता था | हम बच्चों को भी उस कमरे में बैठ कर सुनने की आज्ञा थी पर कभी- कभी पद्मा जी कहतीं , “ ओ चिंगड़ पोड़ ! रौला नई पाओ |” ( ओ छोटे बच्चो! चुप रहना |” मुझे वैसे अभी तक ‘चिंगड़ पोड़’ का असली मायने नहीं पता | शायद रूपये - पैसे  में चिल्लर को डोगरी में यही कहते होंगे | बड़े संगीतकारों  में हमारी  यही अहमियत हो सकती थी  |

यह बात मैं इसलिए भी लिख रही हूँ क्यूँकि पद्मा जी उस उम्र में भी अपनी बात को बेबाकी से कह देतीं थी | फ़र्क सिर्फ इतना था जो भी बात कहतीं साथ में बड़ा सा ‘गढ़ाका’ ( ठहाका ) ज़रूर होता था |

 

पद्मा जी को जम्मू का हर बड़ा-छोटा निवासी ‘बोबो’ नाम से पुकारता था | जम्मू में घर की सब से बड़ी लड़की को बोबो ही पुकारा जाता है | उन्हें हर जम्मू वासी से इतना स्नेह मिला कि वह ‘जगत बोबो’ हो गईं |उन दिनों  जम्मू की युवा लडकियाँ घर से बाहर जाते समय सर को ओढ़नी से ढक लेतीं थी | यह प्रथा धीरे- धीरे समाप्त होते गयी लेकिन पद्मा बोबो ने इसे कभी नहीं छोड़ा | जम्मू के महाराजा डॉ कर्ण सिंह जी की पत्नी महारानी यशोराज लक्ष्मी भी हर समारोह में सर ढक कर ही आतीं थी | कई बार पद्मा जी  को भी मैंने उनके साथ जम्मू रडियो के कार्यक्रमों  में बैठे देखा था | दोनों के सर ढके रहते थे | मुझे उनकी यह आदत बहुत अच्छी लगती थी |

 

‘बोबो’ केवल कविता लिखती ही नहीं थी, उनका कंठ भी बहुत सुरीला था | जम्मू में शादियों के दिनों में गीत -संगीत कई दिन पहले ही शुरू हो जाता था | रात होते ही मोहल्ले की लडकियाँ और स्त्रियाँ किसी बड़े आंगन या बरामदे में एकत्रित हो कर डोगरी-हिन्दी के प्रचलित गीत गातीं थी | मुझे याद है ढोलक सदा बोबो जी के हाथ से ही बजता था और वो दिल खोल कर, पूरे खुले सुर में गाती  थीं| वह बड़े अधिकार से हम छोटी  लड़कियों को कहतीं , “ कुड़ियो ! ताली बजाओ |” हमारा काम केवल ताली बजाना था | बड़ों की महफ़िल में ‘चिंगड़ पोड़’ का क्या काम !

 

पद्मा जी को याद करूँ और जम्मू के पारम्परिक पहनावे और आभूषणों की बात न हो ,यह तो शहद को मीठा न कहने जैसे बात होगी | जिन दिनों की मैं बात कह रही हूँ उन दिनों जम्मू की महिलाएँ लम्बे कुर्ते के साथ डोगरी सुत्थन ( आधुनिक चूड़ीदार पाजामा) पहनती  थीं | सभी  युवा लडकियाँ तो कभी-कभी  पहनती थी लेकिन पद्मा बोबो हमेशा पहनती थीं | हो सकता है बहुत प्रकार के गहने भी होंगे उनके पास लेकिन मैंने उन्हें सदा कानों में डोगरी झुमके ही पहने देखा | उनमें से किसी में सब्ज़ा लगा होता था और किसी में मोती | अगर साहित्य जगत में कभी भी पद्मा जी की  मुखाकृति को याद किया जाएगा तो उनके ढके हुए सर में भी कानों के सब्जे वाले झुमके अवश्य झाँक लेंगे | यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि भारत के कोने-कोने में जम्मू के पहनावे को पहचान देने का उनका यह अद्भुत ढंग था |

जब मैं बड़ी हो रही थी और जम्मू रेडियो के कार्यक्रमों में मैंने भाग लेना आरम्भ किया था तब बहुत बार उन्हें स्टूडियो में बैठे हुए देखा था | रेडियो स्टेशन के प्रांगन में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में मंच पर उन्हें कविता पाठ करते भी देखा था | तब लगता था कि  कितनी गर्व की बात है कि मंच पर राज्य से बाहर से आये कवियों के साथ हमारी सुन्दर सी बोबो भी  विराजमान हैं | डोगरी कविता को भारत की अन्य भाषाओं की कविताओं के साथ मंच प्रदान करने का सारा श्रेय उस समय की एक मात्र डोगरी महिला कवयित्री पद्म श्री पद्मा सचदेव को ही जाता है | उन्हीं दिनों कुछ वर्षों के लिए जम्मू की प्रिय कवयित्री  अपने स्वास्थ्य लाभ के लिए कश्मीर चली गयी थीं | मैंने भी उन्हें युवा कलाकारों की मित्र मंडली की महफिलों बहुत समय तक नहीं देखा| अचानक जम्मू वासियों के लिए यह खबर बड़ी उत्साह वर्धक थी कि पूर्णतया स्वस्थ हो कर पद्मा बोबो जी दिल्ली रेडियो स्टेशन में डोगरी भाषा में  समाचार वाचिका  के रूप में नियुक्त  हुई है | जम्मू के लोग बड़ी शान से रेडियो पर डोगरी में समाचार सुनते थे | शान से इसलिए क्यूँकि तब तक डोगरी भाषा को भारत की भाषाओं में मान्यता नहीं मिली थी | डोगरी को मान्यता प्रदान करने की लड़ाई में पद्मा जी ने अथक प्रयत्न किया था |

 कुछ बातें मानस पटल पर इस तरह अंकित हो जाती हैं कि वर्षों तक वे आपके जीवन की धरोहर बन जाती हैं | मेरे लेखन के बिलकुल आरम्भिक दिनों की बात है | सैनिक  पत्नी होने के कारण मैं मेरा जम्मू जाना कम होता था लेकिन जब भी जाती, जम्मू रडियो पर किसी  न किसी कार्यक्रम में भाग अवश्य लेती थी |एक बार पद्मा बोबो जम्मू आई हुई थीं और जम्मू रेडियो स्टेशन में एक परिचर्चा के समय मैं उनके सामने बैठी थी | परिचर्चा के बाद उन्होंने पूछा, “ कुड़िये ! कुछ लिखती भी हो, कोई कविता -कहानी ?” 

तब तक मैंने जम्मू रेडियो के लिए एक दो कहानियाँ लिखी थी और कुछ कच्ची-पक्की कविताएँ |मैंने संकोच में कह दिया, “ जी, थोड़ा -बहुत |”

 मेरी ओर बड़े स्नेह से देखते हुए बोलीं, “ थोड़ा लिखो या ज़्यादा, पर शैल ( सुंदर ) लिखो |” और हँसती हुई स्टूडियो से बाहर चली गईं | पद्मा जी को एक जगह पर बाँध के रखना असंभव  था | वह तो हवा के ठंडे झोंके की तरह पूरे वातावरण को शीतल कर देतीं थी | भला बहती बयार को भी कोई रोक सकता है ----

 

इस विषय में मुझे एक रोचक घटना याद आती है ----

 

वर्ष, 2002 में मेरे  काव्य संग्रह ’पहली किरन’ के लोकार्पण के लिए मैंने जम्मू के भूतपूर्व महाराज और विश्व प्रसिद्ध विद्वान डॉ कर्ण सिंह जी को आमंत्रित किया | मैं यह भी चाहती थी कि दिल्ली में बसने वाले अन्य जम्मूवासी भी इस कार्यक्रम में  आयें | मुझे पता चला कि पद्मा जी बम्बई छोड़ कर दिल्ली में बस गयी हैं | मैंने तुरंत उनको फोन किया और शाम को मिलने का समय माँगा | वह थोड़ी अस्वस्थ थीं लेकिन मुझे बुला लिया | घर की बैठक में बैठी हुई पद्मा जी मुझे पूरी की पूरी जम्मू  की  महिला की प्रतिमूर्ति ही लगीं | दुपट्टे से सर ढका हुआ और कानों में झुमके मुझे पंचतीर्थी की गलियों  में ले गये | उन्हें देखते ही मैं उनसे लिपट कर रोने लगी |  मुझे उनमें अपनी माँ, बड़ी बहनें, और वो सारी मौसियाँ , मामियाँ और भाभियाँ  दिखाई दे रही थीं | उन्होंने यही कहा , “ कह नहीं सकती आ पाऊँगी लेकिन बहुत सा प्यार - आशीर्वाद |” बातें करते- करते उनके पति भी कमरे में आ गये | अब  तो हमने जम्मू के सारे पकवान, सारी मिठाइयाँ अक्षर-अक्षर चख लीं | हर बात पर उनकी बिंदास  हँसी ने स्वाद और भी बढ़ा दिया था | मुझे पूरी आशा थी कि वह अवश्य आयेंगी | मैंने आते समय उनके गले लगते हुए कहा था , “ बोबो !आप  पर मेरा पूरा अधिकार है , आपके गीत पढ़ और सुन कर ही तो मुझे लिखने की प्रेरणा मिली है | आप का आना तो शत प्रतिशत बनता है |”

आते-आते उन्होंने अपनी दो पुस्तकें मुझे भेंट कीं और कहा, “ डोगरी ही हमारी  पहचान है, जितना लिखोगी मुझे अच्छा लगेगा |”

 

दो दिन बाद पद्मा जी लोकार्पण के कार्यक्रम में आईं | मुझे याद है उन्होंने अपने वक्तव्य में मेरी रचनाओं के विषय में कम शब्द बोले लेकिन डोगरी भाषा को भारतीय भाषाओं में मान्यता दिलाने की अपनी बात रखी | तब मुझे लगा था कि शायद उन्हें मेरी रचनाएँ पसंद नहीं आईं| लेकिन अब जानती हूँ कि डोगरी  भाषा को भारतीय  संविधान के अंतर्गत भाषाओं की आठवीं अनुसूची  में  मान्यता दिलवाने की उनकी मुहिम का उस समय कितना महत्व था | सभागार में बहुत से दिल्ली के गणमान्य साहित्यकार और सैनिक अधिकारी भी थे | जम्मू की यह शब्द सेनानी हर मंच के द्वारा अपनी बात कहने को तैयार रहतीं थी | मुझसे यही कहा, “ डोगरी में भी लिख, ज़रूरी है |”

 

उन्ही दिनों बोबो अपना उपन्यास ‘इक ही सुग्गी’ लिख रहीं थी | हिन्दी में  अनुवाद के बाद  इसका  नाम था  ‘ जम्मू जो  कभी शहर था’| ( इस उपन्यास की केंद्र बिंदु  ‘सुग्गी’ वास्तव में एक पात्र नहीं जम्मू की संस्कृति और  परम्परा की जीती जागती तस्वीर है | मेरे बचपन वाले घर के पास ही सुग्गी का भी एक कमरे वाला घर था | पद्मा जी ने फोन पर मुझसे सुग्गी के विषय में मेरी बचपन की सुधियों को टटोला | जो भी मुझे याद था मैं उन्हें बताती चली गयी | इसके बाद मैंने जब यह उपन्यास पढ़ा तो लगा कि जैसे सारे पात्रों को मैं जानती थी, सारी घटनाएँ मेरे सामने घट रही थीं | उनकी लेखनी का ऐसा सम्मोहन था कि वह उपन्यास पढने जैसा नहीं, चलचित्र देखने जैसा अनुभव था |  इसी संदर्भ में एक बात और याद आ रही है ----

शायद उसी वर्ष मैंने फिर उन्हें जम्मू एयर पोर्ट पर देखा | छोटे से स्वागत कक्ष में बहुत शोर था | पद्मा जी के हाथ में नोटपैड और पेन्सिल थी | मेरे अभिवादन का बस मुस्करा कर उत्तर दिया और कुछ लिखती गईं | मैंने बहुत कोशिश की बात करने की लेकिन वह हाँ - न कह देतीं और लिखती रहीं | मैंने  तिरछी नज़र से देखा तो वह अपने उपन्यास के नोट्स ही लिख रही थीं | कहने लगीं, “ बहुत लोगों से मिली हूँ , बहुत कुछ सुना है , भूल न जाऊँ |”

मेरे लिए यह बहुत बड़ी सीख थी कि अपने विचारों को उसी समय संभालना कितना आवशयक है |

 

पद्मा जी का नाम लेते ही उनके रूह तक पहुँचने वाले गीत स्वत: ही होठों पर मिश्री घोल देते हैं | उनके गीत  प्रकृति , प्रेम,भक्ति दर्शन , मिलन , विरह, देश- प्रेम, वात्सल्य, शृंगार आदि  सभी भावों-अनुभावों से ओतप्रोत थे | कहीं अपने शहर से दूर ब्याही लड़की के मन की पीड़ा और कहीं सैनिक पत्नी का वियोग, कहीं जम्मू की नदियों की जलधारा की कलकल और कहीं जम्मू को अपने अंक में समेटती हुई पर्वत चोटियों का सुन्दर चित्रण उनकी रचनाओं को केवल पठनीय नहीं अपितु गुनगुनाने के लिए बाध्य कर देता है | उनकी लेखनी का शायद यही आकर्षण होगा कि स्वर सम्राज्ञी आदरणीया लता जी ने भी उनके गीतों को स्वर दिया |

 

जम्मू के हर शादी ब्याह में या अन्य उत्सवों में पद्मा जी के गीत गाये जाते हैं | उन्होंने डोगरी के साथ-साथ हिन्दी में भी बहुत गीत लिखे हैं | उन्होंने कई फिल्मों के लिए भी गाने लिखे हैं जिनमें फिल्म प्रेम पर्बत के लिए लिखा उनका गीत ‘मेरा छोटा सा घर बार’ बहुत लोकप्रिय हुआ था | इसी संदर्भ में मैं एक बहुत ही प्यारी सी याद आपके साथ  साझा करना चाहूँगी---

एप्रिल, 2021 में मेरी भांजी अंजलि के लिए पूरे परिवार ने ज़ूम पर ‘बेबी शावर’ की रस्म निभाने का निर्णय लिया | अंजलि स्विटज़रलैंड में रहती है, मैं अमेरिका में और मेरा सारा परिवार भारत में | उसके सास-ससुर फ़्रांस में |

ज़ूम पर हमने पूरी परम्पराओं  के साथ ‘गोद भराई’ की रस्म निभाई | आशीर्वाद देते हुए मेरी भांजी ने भारत से पद्मा जी द्वारा रचित प्रसिद्ध लोरी गाई |

शब्द थे --- तू मल्ला तू -- लोक पन्नन ठिकरियाँ / बदाम पन्नें तू / लोक बौन मंडिया /न्या करें तू |

               ( ओ मेरे लल्ला ! लोग जब पत्थर तोड़ें , तू बादाम तोड़ना, लोग मंडी में बैठें और तू राज बन  कर न्याय सुनाये )|  इस गीत को लता जी ने भी बहुत ही मधुर स्वर में गाया  है |  सब से मनोरंजक बात यह थी कि मेरी भांजी डोगरी में गा रही थी, मैं उसे अंजलि के फ्रेंच पति के लिए अंग्रेज़ी में अनुवाद कर रही थी और वह अपने केवल फ्रेंच जानने वाले माता -पिता के लिए इस लोरी का फ्रेंच भाष में अनुवाद कर रहा था |  उस दिन पूरा विश्व एक सूत्र में पिरो गया था और इसकी डोरी थी पद्मा जी द्वारा लिखी लोकप्रिय लोरी |

उनका एक और बहुत ही मीठा गीत जम्मू की हर  उम्र की  लड़की गाते हुए अपने पीहर को याद करती हुई सुबकने लगती है  | गीत के बोल हैं ---

निक्कड़े फंगडू उच्ची उड़ान/ जाइए  थम्मना कियाँ  शमान / चाननियाँ गले कियाँ लानियाँ --- ( छोटे से पंख और ऊंची उड़ान / कैसे  छू लूँ यह आसमान / चांदनी को गले कैसे लगाऊँ ) | इस गीत को भी लता जी ने स्वर देकर अमर कर दिया है |

उन्हें कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से  कई सम्मान मिले  जिनमें ये मुख्य थे -- पद्मश्री , सरस्वती सम्मान, कबीर सम्मान और साहित्य अकादमी पुरस्कार | गिनने लगूँ तो सूची लम्बी हो जायेगी |  लेकिन शायद उनका सब से बड़ा पुरस्कार है जम्मू और देश के अन्य प्रान्तों के लोगों द्वारा उन्हें दिया गया अथाह स्नेह | वह जहाँ भी जाती थीं, उन्मुक्त हँसी का एक निर्झर झरने लगता था | जिस मंच पर वह विराजमान होतीं थी, उनके  व्यक्तित्व की आभ से  वहाँ धूप अपने आप खिल जाती थी| जब वह स्वरचित गीत स्वयं गाती थीं तो लगता था जैसे शब्द -साज और सुरों का उत्सव हो रहा हो |उनकी दो पुस्तकें ‘ मेरी कविता -मेरे गीत’ और ‘तेरी बात ही सुनाने आई हूँ’ मेरे पास उनके अद्भुत लेखन की अमूल्य निधियाँ हैं | उनकी अन्य कृतियाँ  में उनके समृद्ध और समग्र लेखन की झाँकी मिलती है | जिनमें से कुछ कृतियों का उल्लेख किये बिना भला उन्हें कैसे याद किया जा सकता है | ‘तवी ते चनाब’ ‘नेहरियाँ गलियाँ’, पोता-पोता निम्बल, उत्तर वाहिनी, दीवानखाना , चित्त चेते  जैसी अनुपम कृतियों से उन्होंने साहित्य जगत को अमोल निधियाँ दी हैं |उन्हें याद करते हुए लगता है जैसे मैं अपने प्रिय जम्मू की  रूह से मिलने जा रही हूँ |

 

 पद्मा बोबो  जम्मू-कश्मीर से बाहर ब्याही लड़कियों को उनकी  नागरिकता बनाये रखने के अधिकार के लिए अपनी पूरी उम्र लड़ीं| भारत की स्वतन्त्रता के बाद भी जम्मू-कश्मीर पूरी तरह से भारत का भाग नहीं था | जम्मू से बाहर ब्याही  लड़कियों को अपने राज्य में सम्पति बनाने का कोई अधिकार नहीं था| अनुच्छेद  370 के कारण उन लड़कियों से नागरिकता का अधिकार भी छीन लिया गया था | पद्मा जी तन-मन से जम्मू की ही थीं लेकिन उनको भी  जम्मू में अपना घर बनाने का कोई अधिकार नहीं था |

 मुझे पाठकों को यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि वर्ष  2019  में भारत सरकार ने पार्लियामेंट में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया|  आर्टिकल 370 को निरस्त कर दिया गया और जम्मू-कश्मीर एक केंद्र शासित प्रदेश घोषित हो गया | इस घोषणा के फलस्वरूप एक महत्वपूर्ण बात हुई | जुलाई, 2021 में एक और प्रस्ताव पारित हुआ जिसके अंतर्गत जम्मू से बाहर ब्याही लड़की को अपनी जन्मभूमि की नागरिकता का पूरा अधिकार मिल गया | अब कोई भी जम्मू-कश्मीर से बाहर ब्याही हुई लड़की ‘देस निकाला’ जैसी दुखद भावना से पीड़ित नहीं होगी | उसे अपनी जन्मभूमि में सम्पत्ति बनाने  का पूरा अधिकार भी  मिल गया |  मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि पद्मा जी ने यह सुखद समाचार अपने जीवन काल में सुना | उन्हें कितनी खुशी और संतोष हुआ होगा |  अपनी प्रसन्नता को उन्होंने इन  शब्दों में व्यक्त किया था --’वैसे तो जम्मू हमेशा मेरे दिल में बसता है, लेकिन जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद से जम्मू मेरे दिल में ज्यादा बसने लगा है।’ काश मैं उनसे बात करके उनकी खुशी को सुन भी सकती |

 

आज पद्मा जी इस नश्वर संसार से नाता तोड़ कर चली गईं हैं लेकिन ,जब तक यह धरती रहेगी,आकाश रहेगा, जम्मू रहेगा,उनके गीत उनकी लोरियाँ, रुबाइयाँ पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के दिलों में जीवित रहेंगी  | हिन्दी और डोगरी के साहित्य जगत में उन्हें युगों -युगों तक याद किया जाएगा | हमारे हृदय में सदैव रहने वाली  हम सब की प्यारी ‘पद्मा बोबो’ को नम आँखों से लौकिक विदाई -----

 

शशि पाधा

 

 

 

 

               एक अंतहीन प्रेम कथा

                                                 (लांस नायक मोहन गोस्वामी, अशोक चक्र)

 

 “ मेरा हिन्दोस्तानी होना सिर्फ एक अहसास ही नहीं मेरी पहचान है

     और मेरा भारतीय सैनिक होना सिर्फ एक काम ही नहीं

      मेरा धर्म है, मेरा मान है”

यह उद्गार है, परमवीर योद्धा  अमर शहीद लांस नायक मोहन गोस्वामी के |यह  भारतीय सेना की महत्वपूर्ण यूनिट ‘9 पैरा स्पेशल फोर्सेस’ के निर्भीक योद्धा थे | इन्हे 26 जनवरी 2016 के स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर उनकी वीरता तथा महाबलिदान के लिए राष्ट्र के सर्वोच्च सम्मान ‘अशोक चक्र’ से विभूषित किया था |

 अलंकरण समारोह में उद्घोषक लांस नायक मोहन गोस्वामी के अदम्य साहस और शौर्य का वर्णन करते हुए बोल रहे थे, “ इस शूरवीर सैनिक ने केवल 10 दिनों में 11 आतंकवादियों को मौत के घाट उतार दिया | 2 और 3 सितंबर 2015 की रात को लांस नायक मोहन नाथ गोस्वामी जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के हफरूदा जंगल में घात लगाने वाले दस्ते में शामिल थे। उसी रात चार आतंकवादियों के साथ उनकी भीषण मुठभेड़ हुई। इसमें उनके दो साथी घालय होकर गिर पड़े। लांस नायक मोहन दो साथियों के साथ अपने सहयोगियों को बचाने के लिए आगे बढ़े। जबकि उन्हें अच्छी तरह ज्ञात था कि आगे बढ़ने में उनके जीवन को खतरा है। लांस नायक मोहन ने पहले एक आतंकवादी को मार गिराने में मदद की । उसके बाद अपने तीन घायल साथियों की जिंदगी पर आसन्न खतरे को भाँपते हुए, अपनी निजी सुरक्षा की परवाह न कर के बचे हुए आतंकवादियों पर टूट पड़े| दोनों ओर से भयंकर फायरिंग हुई | अचानक उनके पेट में एक गोली लगी।  अपने गंभीर घावों के बावज़ूद मोहन नाथ ने बचे हुए अंतिम आतंकवादी को दबोच लिया और उसे मार गिराया। इस अभियान में लांस नायक मोहन नाथ ने न केवल दो आतंकवादियों को मार गिराया, बल्कि अन्य दो को निष्क्रिय करने में भी सहायक हुए और अपने तीन घायल साथियों की जान बचाई। अंत में अपने लक्ष्य की पूर्ति के बाद यह योद्धा सदा के लिए माँ भारती की गोद में सो गया| लांस नायक मोहन नाथ गोस्वामी ने व्यक्तिगत रूप से आतंकवादियों को मार गिराने और अपने घायल साथियों का बचाव करने में सहायता प्रदान करते हुए भारतीय सेना की सर्वोच्च परंपराओं के अनुरूप अपना सर्वोच्च बलिदान दे कर विशिष्ट वीरता का प्रदर्शन किया । आज कृतज्ञ राष्ट्र इन्हें इनकी अप्रतिम वीरता के लिए सर्वोच्च पदक से विभूषित करते हुए गौरवान्वित है|”

उद्घोषक के ओजपूर्ण स्वर में इस शौर्य गाथा को सुनते ही सारा आकाश करतल ध्वनि से गूँज उठा | इस पदक को उनकी पत्नी भावना गोस्वामी ने करतल ध्वनि की गूँज के मध्य नतमस्तक होकर ग्रहण किया |

 मैं, समारोह का यह विवरण हज़ारों मील दूर बैठी अमेरिका में अपने टी वी स्क्रीन पर देख रही थी | भावविह्वल होकर मैंने कहा था, “ धीरज रखना बहन, मैं शीघ्र ही तुमसे मिलने आऊँगी |”

मेरा ममता से भरा हृदय उस समय उस दुबली-पतली लड़की को गले लगाने के लिए आतुर था |मुझे इस बात का अहसास था कि भारत के एक पहाड़ी नगर नैनीताल के पास बसे एक छोटे से गाँव ‘लालकुआँ’ में बैठी भावना मेरे अश्रुपूर्ण शब्द नहीं सुन रही है, किन्तु मुझे स्वयं से यह प्रण करके आन्तरिक सांत्वना मिली थी |

 कुछ ही महीनों बाद जुलाई में ‘9 पैरा स्पेशल फोर्सेस’ के ५०वें स्थापना दिवस के उत्सव में आई भावना से मिल कर खुद से किया यह वायदा पूरा हुआ |  उसे गले लगाते ही मैंने उसके सामने मन में उठते प्रश्नों की गठरी खोल दी थी |

  मैंने कहा, “ भावना, मैं आपको तब से जानती हूँ जब मैंने टी वी स्क्रीन पर आपको राष्ट्रपति से अशोक चक्र एवं प्रशस्ति पत्र ग्रहण करते हुए देखा था | तब से मैं यही सोचती हूँ कि इतनी छोटी आयु, आगे की इतनी लम्बी जीवन डगर, कैसे, और किसके सहारे -------”

“ मैम, मैं आठ जन्म, आठ युग, आठ लोक, कहीं पर भी जन्म लूँ , मुझे उनके जैसा और कोई मिल नहीं सकता | मेरे हर एकाकी पल में वो मेरे साथ हैं | वही मेरा अतीत थे; वही मेरा वर्तमान हैं, और उनकी मधुर स्मृतियाँ ही मेरा भविष्य हैं| उनके सहारे ही जी रही हूँ|”

उसका त्वरित उत्तर सुनकर मैंने बड़े प्यार से पूछा, “ भावना, यह आठ का आँकड़ा क्यूँ ?”

अब उसके होठों पर हल्की सी मुस्कराहट थी और उसकी बड़ी-बड़ी उदास आँखें अतीत की खोह में कुछ ढूँढ रही थी|

एक गहन उच्छ्वास लेते हुए वह बोली, “ मैंने मोहना के साथ आठ वर्ष का सुखद वैवाहिक जीवन बिताया है | |इन आठ वर्षों में मैंने जो भोगा-पाया, वो सुख मेरे लिए आठ जन्मों की धरोहर है | वही जन्मों-जन्मों तक मेरा सम्बल है |”

मेरे सामने दुबली-पतली सी लड़की बैठी थी किन्तु उसके स्वर में वही ओज झलक रहा था जो आज की वीर नारी का सब से दृढ़ रक्षा कवच है | मुझे उसके स्वर में कहीं कोई कँपकपी, कोई घबराहट नहीं दिखी | मुझे लगा कि यही तो एक मुख्य लक्षण है जो वीर नारी को एक अलग पहचान देता है |

मैं श्रद्धा से उसे देख रही थी और वह अपने छोटे से वैवाहिक जीवन की प्रेम भरी गाथा सुना रही थी |

“ मैम, बहुत शरारती थे मोहना | मुझे बिना बताए ही वो छुट्टी आते और घर के दरवाज़े पर खड़े हो कर मुझे हैरान कर देते थे | आनन–फानन में छत पर खड़े होकर गाँव वालों को आवाजें लगा कर कहते थे – ‘चाची मैं आ गया, बुआ शाम का खाना आपके साथ !’ आस-पास के बच्चों के लिए भी उपहार लाते थे | सारे गाँव का ‘लाडला बेटा’ थे वे | इतनी मौज मस्ती करते थे कि गाँव वाले स्नेह से इन्हें ‘रौनकी’ नाम से बुलाते थे |”

भावना अपने बीते जीवन की मीठी यादों में खो गई थी और मैं उसके हाव-भाव, उसके शब्दों की मीठास में डूब रही थी | मोहन ने उसे किसी शादी में देखा था और उससे शादी का प्रस्ताव कर बैठा था, और उस दिन भी तारीख़ थी – आठ |

मैंने मोहन और भावना की एक सुंदर सी तस्वीर में भावना के गले में प्यारा सा मंगल सूत्र देखा था | मैंने पूछ लिया, “ तो वो मंगल सूत्र भी आठ धागों से पिरोया होगा ?”

हँस कर कहने लगी, “ नहीं मेम साब, वो तो इन्होने मुझे शादी की दूसरी साल गिरह पर पहनाया था | मैंने बहुत कहा था कि पहले घर बनवा लेते हैं फिर दूसरे खर्चे | पर कहाँ माने थे वो | लाकर पहना दिया था |”

आज वो मंगल सूत्र तो नहीं देखा किन्तु उसके स्थान पर पतले से काले धागे में पिरोई काले मनकों की माला थी | पहाड़ में मैंने बहुत सी लड़कियों को ऐसी माला पहने देखा है | अच्छा लगा कि उसका गला और कलाई सूनी नहीं थी |

मैंने सुना था कि मोहन अच्छा शायर भी था | उसकी इस खूबसूरत कला के विषय में मैंने भावना से पूछा, “ बहुत से गीत गाए होंगे उसने तुम्हारे लिए | गीतों में तुम्हें बहुत कुछ कह जाता होगा| अच्छा तो तुम्हारी किस चीज़ की वो सबसे अधिक प्रशंसा करता था ?”

पहली बार मुझे आभास हुआ कि वो थोड़ा झिझकी थी | कुछ पल चुप रही फिर हँस कर बोली, “ मेरी आँखें | कहते थे तेरी आँखों में कोई समन्दर है | तुम काजल मत लगाया करो |” मैंने उसकी आँखों में उमड़े पीड़ा के तूफ़ान को देख लिया था | इससे पहले कि वो किनारे तोड़ जाए मैंने जल्दी से पूछा, “ और तुम्हें ?”

बड़े कोमल भाव से उसने कहा, “ मुझे तो वो पूरे के पूरे ही अच्छे लगते थे | किस-किस की तारीफ़ करूँ ? वो हैं ही इतने अच्छे ----थे |”  थे’ बोलने में उसने थोड़ा समय लिया था |वो अपने अतीत में खो गई थी और मैं उसे बाहर नहीं लाना चाहती थी | सुना था मीठी यादें ही दारुण पीड़ा की औषधि होती हैं | हम दोनों ही कमरे में चुप-चाप बैठे, मौन में उस पीड़ा की मरहम ढूँढ रहे थे |

अभियान से एक दिन पहले उसने अपनी डायरी में एक छोटी सी कविता लिखी थी –

“पत्नी के निस्वार्थ प्रेम की खुश्बू को महकता छोड़ के आया हूँ

   मैं नन्हीं सी चिड़िया बेटी को चहकता छोड़ के आया हूँ

   मुझे सीने से अपने तू लगा ले ऐ भारत माँ

   मैं अपनी जन्मदायिनी माँ को तरसता छोड़ के आया हूँ ”

मैंने कई बार इन पँक्तियों को पढ़ा था | इन्हें भीतर तक महसूस करते हुए मैं यही सोचती थी कि 10 दिन में 11 खूँखार आतंकवादियों को मौत के घाट उतारने वाले इस शूरवीर योद्धा के हृदय में और कितनी जगह होगी जहाँ शौर्य और पराक्रम की उद्दात भावना के साथ पति, पिता और सुपुत्र के मनोभावों की अविरल नदिया बहती रहती हो | मैं सदैव इस बात को मानती हूँ कि सैनिक केवल ‘घातक’ नहीं होता | वह पति, पुत्र, मित्र, पिता, शायर, गायक, सेवक और अभिनेता भी होता है |वह ‘अर्जुन’ तब होता है जब उसे धर्म की रक्षा करनी होती है | वह धर्म चाहे राष्ट्र रक्षा हो, चाहे मानव रक्षा | उस समय वह रक्षक का चोला पहन कर अपना कर्तव्य निभाने चल पड़ता है |

 अब तक भावना थोड़ी सहज हो गई थी | पास में बैठी थी उसकी छोटी सी बिटिया | मैंने उससे पूछा, “ बहुत सुंदर नाम है आपका ‘भूमिका’| किसने नाम रखा था आपका ?”

भूमिका ने बाल सुलभ भोलेपन से कहा, “ मेरे पापा ने | पर वो मुझे कभी गुड़िया और कभी चिड़िया ही बुलाते थे |”

हँसते हुए भावना बोली, “ बहुत सोच-विचार के बाद ही यह नाम चुना था मोहना ने | मेरे नाम का ‘भ’ और अपने नाम का ‘म’ जोड़ कर ही वो अपनी पहली सन्तान का नाम रखना चाहते थे |”

मैंने भी उत्सुकता वश पूछ लिया, “ और अगर लड़का होता तो ?”

बिना समय गँवाए उत्तर था , “ भौम या भीम |” अब हम दोनों ही सहज होकर हँस रहे थे |

स्वयं एक सैनिक पत्नी होने के नाते मैं वियोग की वेदना भोग चुकी थी | उस लम्बी और अनिश्चित अवधि में पत्र ही हमारा सहारा होते थे | अपने बीते कल को याद करते हुए मैंने भावना से पूछा, “ जब से देश की उत्तरी सीमाओं को आतंकवाद ने घेर रखा है, हमारी पलटन के सैनिक अधिकतर सीमाओं पर ही तैनात रहते हैं | ऐसे में बहुत कम समय के लिए ही तुम उनके साथ रह पाती होगी | केवल लम्बे-लम्बे पत्र ही तुम्हारा सम्पर्क सूत्र होंगे ?”

उसने बड़ी हैरानी से मेरी ओर देखा कि मैं कैसा सवाल कर रही हूँ, और फिर कहने लगी, “ मैम, पत्र कहाँ, आज कल तो WhatsApp , Messenger पर ही सारा पत्र व्यवहार होता है | कोई भी दिन खाली नहीं था जब हम  स्काईप पर या ‘व्हट्स एप’ पर बात नहीं करते थे |”

मैं भी कितनी नादान थी | इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि मैं अपनी अगली पीढ़ी से बात कर रही थी | मैंने कुछ झिझकते हुए कहा, ‘ओह ! मैं तो भूल ही गई थी कि अब डाक से पत्र तो कोई भेजता ही नहीं है |”

इससे पहले कि मैं कुछ और पूछती वो बोली, “ उनके फोन की एक अलग से रिंग टोन मैंने सहेज रखी थी | आधी रात को भी फोन आता तो मैं उठा लेती थी |”

थोड़ी देर के लिए भावना चुप रही और फिर अपने पर्स से एक मोबाइल निकाला |मोहना के फोन की रिंग टोन लगाई और बहुत अस्फुट स्वर में बोली, “ अब मैं खुद ही फोन करती हूँ और खुद ही सुनती हूँ |”

मैं थोड़ा काँप गई थी | इतनी बहादुर लड़की और भीतर से इतनी भावुक, इतनी कोमल | कैसे होंगे वो अंतहीन प्रतीक्षा के पल जब भावना केवल मोहन के फोन की घंटी ही सुनना चाहती होगी और फिर अपने को ही सुना कर मौन सांत्वना देती होगी !!

भावना ने मुझे यह भी बताया था कि मोहन उसे आगे पढ़ने के लिए बहुत उत्साहित करते रहते थे | स्वयं उन्होंने 12वीं कक्षा तक पढ़ाई की थी, लेकिन उन्हें बहुत गर्व था कि भावना ग्रेजुएट थी |

मैं अब तक मोहन और भावना के छोटे से प्यार भरे जीवन के विषय में बहुत कुछ जान गई थी, किन्तु अनुभव यही कहता था कि कोई तो पल होगा जब भावना को मोहन की जीवन रक्षा के विषय में डर लगता होगा या आशंका होती होगी | सुदूर पहाड़ों में रहने वाली लड़की को कितना पता था कि जिस पलटन में मोहन सेवारत था उस पलटन को सदैव शत्रु के साथ आमने-सामने युद्ध करना पड़ता है | स्पेशल फोर्सेस में होने के कारण उनका हर अभियान, हर युद्ध ख़तरों से भरा होता है |

मैंने यही प्रश्न उससे पूछा, “ वे कभी आपसे अपने इस चुनौती पूर्ण व्यवसाय की बात करते थे | कभी बताते थे कि अभियान पर जाते हुए कितने खतरों का सामना करते हैं ?”

उसने बिना संकोच के कहा, “ वे हमें अपने काम के विषय में जितना आवश्यक था, उतना ही बताते थे | पता नहीं क्यूँ पर वो मुझे भविष्य के लिए सदैव तैयार  करते रहते थे | अगर कभी मैं डरती थी तो कहते थे – मैं कमांडो हूँ , पूरे दस को लेकर जाऊँगा | अब सोचती हूँ कि क्या सभी सैनिक अपने परिवार को यूँ ही सचेत करते रहते हैं या इन्हें मेरी बहुत चिंता थी | पता नहीं, वही जानें |”

मोहन के सैनिक होने का गर्व जितना मोहन को था उतना ही भावना को भी | बताने लगी, “ मोहन कहते थे, बचपन से ही उन्हें कमांडो बनने का शौक था | उनके पिता भी भूतपूर्व सैनिक थे | इसीलिए सैनिक धर्म तो उन्हें जन्म घुट्टी में ही पिला दिया गया था | किन्तु कमांडो ही बनना है, यह जुनून तो विद्यार्थी जीवन में ही उनके मन-मस्तिष्क में छा गया था | सेना में भर्ती होने से पहले निर्भीक कमांडो बनने के लिए उन्होंने पूरी तैयारी कर ली थी |”

अचानक बात करते करते उसने मुझसे पूछा, “ मेम साब जी, क्या आप मोहना को जानती थीं , कभी उससे मिली थी ?”

मैंने बड़े स्नेह से उससे कहा, “ कभी नहीं मिली | पर एक बात कहूँ, पति के सेवा निवृत होने के बाद भी हमें अपनी पलटन से उतना ही प्यार, लगाव रहता है जितना नौकरी के समय था | फिर दूरी कैसी ? इस नाते मैं मोहन को जानती थी | जिस दिन मोहन ने वीरगति प्राप्त की थी उस दिन मैंने विभिन्न समाचार पत्रों में उसकी तस्वीर देखी थी | एक तस्वीर में तुम और भूमिका भी उसके साथ थी | कितने खुश लग रहे थे आप तीनों | उसी दिन मैंने यह संकल्प लिया था कि तुमसे अवश्य मिलूँगी, कभी |”

अब मैं थोड़ी भावुक थी | मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर भावना मुझसे बोली, “ आप मेरी से बड़ी हैं | मेरी बेटी को आशीर्वाद दीजिए कि यह अपने पापा का नाम ऊँचा करे | मैं इसे डॉक्टर बनाना चाहती हूँ, सेना में भेजना चाहती हूँ | बस यही मेरा एक मात्र लक्ष्य है |”

मैंने उसके स्वर में जो संकल्प का घोष सुना उससे मुझे लगा कि सीमाओं पर शत्रु का संहार करने वाले शूरवीर अपनी वीरांगनाओं के इसी धैर्य और आस्था का संबल पाकर निश्चिन्त हो कर रक्षा कर्म में जुट पाते होंगे |

अपनी बेटी की ओर देखती हुई भावना बोली,” इसके जन्म पर मुझे परिवार से काफी कुछ सुनना पड़ा था क्योंकि घर के बड़ों को पुत्र की चाह थी | पर अब मैं इससे ही अपना वंश चलाऊँगी, इसके नाम के साथ मोहन का नाम सदैव जुड़ा रहेगा |”

भावना के इस रूप को देख कर मुझे बहुत खुशी हो रही थी | किन्तु एक प्रश्न जो मेरे मन में अभी तक बैठा था, पर इतनी हंसती खेलती नवयुवती को मैं फिर से उस दारुण पल की याद नहीं दिलाना चाहती थी, फिर भी पूछ लिया, “ भावना आप को सूचना कैसे मिली ?

धरती पर आँखें गड़ाये दूर कहीं कुछ खोजती सी वो बोली, ” मुझे पता नहीं था कि वो किसी मिशन पर गए हैं | 11 अगस्त को ही तो गुड़िया का जनम दिन मना कर 15 अगस्त को गए थे | कुछ दिन फोन पर भी बात होती रहती थी | पिछले तीन दिनों से नहीं हुई थी | फिर एक दिन इनके दोस्त बार-बार फोन करके पूछ रहे थे कि भाभी आप कैसी हो ? मुझे नहीं पता था कि वो मुझे किसी अशुभ सूचना के लिए तैयार कर रहे थे | फिर शाम को ‘एस एम’ साहब का फोन आया था | कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या कह रहे थे | बस सुन्न सी मैं यही समझ सकी कि ----

अब वो चुप थी | पहली बार मैंने उसके शरीर में कंपन देखी थी | उसकी बच्ची चुपचाप अपनी माँ का हाथ लेकर उसे सहला रही थी | कितने असमय ही बड़े हो जाते हैं शहीदों के बच्चे ! कैसे समझ लेते हैं अपना उत्तरदायित्व !! मैंने उसके मौन को नहीं तोड़ा | उसकी आर्द्र आँखों की पीड़ा मेरी आँखों में भी प्रतिबिम्बित हो रही थी |

उसने गले में पतली सी माला पहन रखी थी जो शायद शादी के समय मोहन ने उसे पहनाई होगी | उसे बड़े प्रेम से छू कर बोली , “ यह है न उनका मेरे साथ होने का चिह्न | और फिर मैंने उनकी लैप टॉप, वर्दी , मोटर साइकल, फोन सभी चीजें सम्भाल कर रखी हैं |

मैंने वातावरण को थोड़ा सहज करते हुए पूछा, “ और उनकी शायरी वाली डायरी ? उसे तो तुम रोज़ पढ़ती होगी ?”

अब वो थोड़ा शर्मा गई थी | भावना ने बताया, “ हाँ पढ़ती हूँ ; कई बार, बार-बार  | और फिर उनके मित्र भी मुझे उनका लिखा भेजते रहते हैं जो उन्होने पलटन में रहते हुए किसी नोटबुक में लिख छोड़ा होगा |”

फिर स्वयं ही कहने लगी, “ मैंने उनकी समाधि बनवाई है, घर के सामने अपनी ज़मीन पर | पहाड़ों में वीरों की समाधि बनवाने का भी प्रावधान है | वहीं पर एक छोटा सा मंदिर बनेगा | गाँव में उनके नाम की सड़क है, स्कूल है | स्टेडियम को भी उनका ही नाम दिया गया है | बहुत से लोग आते रहते हैं उस समाधि पर | कई संस्थाएँ भी मुझे बुलाती रहती हैं | सब से अधिक मैं जो काम कर रही हूँ वो यह है कि मैंने अन्य वीर नारियों से सम्पर्क बना लिया है | उनसे बातचीत करती रहती हूँ |

“और पलटन के साथ क्या सम्पर्क सूत्र है ?” मेरे यह पूछने पर कहने लगी,

“ पलटन ही तो मेरा घर है | फोन भी आते रहते हैं | आप इतनी दूर से मिलने आई हो, आप भी मेरी अपनी हो | मैं अकेली कहाँ हूँ ?”

मेरे मन में मोहन के उस महा अभियान के विषय में कई प्रश्न थे | इसीलिए हम दोनों फिर मिलने का वादा कर के विदा हुए | उसके जाने के बाद मैंने एक अजीब सा एकाकीपन महसूस किया | भावना के साथ मेरा एक अटूट संबंध जो जुड़ गया था |

इस अंतहीन प्रेम कथा की एक और कड़ी थी जिसके कई पन्ने थे और बस उन्ही पन्नों को खोलने के लिए मैं अगले दिन मोहन के दो मित्रों से मिली जो उसके अंतिम अभियान में उसके साथ थे |

 लांस नायक सुरजीत सिंह और नायक भरत मोहन गोस्वामी के परम मित्र थे | वे तीनों आरम्भ से ही एक ही टीम में थे, एक साथ ट्रेनिंग की थी, मस्ती की थी और सभी अभियानों में भी साथ रहे थे | मैंने उनसे मिलते ही सब से पहले मोहन के विषय में, उसके अभियानों के विषय में जानना चाहा |

नायक भरत बहुत गर्व के साथ मोहन के विषय में बताने लगे, “ मेम साहब, मोहन वर्ष 2002 में 9 पैरा स्पेशल फोर्सेस में वालेंटियर हो कर आए थे | तब से अब तक यूनिट ने जितने भी मिशन किए हैं लगभग सभी में उन्होंने भाग लिया था | इस वर्ष भी 15 अगस्त को छुट्टी से आने के बाद सीधे अपनी टीम में आकर सम्मिलित हो गए थे | 23 अगस्त को उनका पहला अभियान कश्मीर के जंगलों में हंदवारा क्षेत्र के ख़ुरमुर स्थान पर हुआ था | वहाँ हमारा भीषण मुठभेड़ हुआ और हमारी टीम ने पाकिस्तान मूल के ‘लश्करे तैएबा’ के तीन कट्टर आतंकवादियों को मौत के घाट उतारने का कार्य सफलता से संपन्न किया था | 26 -27 अगस्त को ‘रफियावाद’ में चलाए गए दूसरे अभियान में भी हमारी टीम तीन खूँखार आतंकवादियों को मौत के घाट उतारने में सफल हुई थी | इस अभियान में पाकिस्तान के मुज्जफर गढ़ का रहने वाला आतंकवादी सज्जाद उर्फ़ अबू उबेद उल्लाह जीवित पकड़ा गया था | इस आतंकवादी के पकड़े जाने से कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देने में पाकिस्तान की भूमिका को साबित करने में महत्वपूर्ण सुराग मिले थे | 2 सितम्बर की रात मोहन का चौथा और अंतिम अभियान था |”

यह बताते हुए भरत चुप हो गया था |कुछ देर तक हम सभी उस पल को जीते रहे | मैंने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “ उस अंतिम अभियान में आप तीनों साथ थे | आपने जो देखा-भोगा, उसे और कोई नहीं दोहरा सकता |”

महाबलिदान की उस रात का विवरण देते हुए सुरजीत बोले, “ हमारी टीम को विश्वस्त सूत्रों से सूचना मिली थी कि खूँखार आतंकवादियों का एक गिरोह यहीं जंगल में आस-पास छिपा है | वे उस रात प्रचुर मात्रा में घातक हथियार, बीहड़ जंगल का नक्शा और खाने पीने का सामान लेकर वहाँ से गुज़रने वाले थे ताकि यह सारा विध्वंसकारी सामान आगे बने हुए किसी आतंकवादी शिविर तक पहुँचा सकें|

मैंने उत्सुकता वश पूछ लिया, “ आपने उन्हें देखा था, वो कितने लोग थे और आपको इतने अँधेरे में कैसे पता चला कि दो वहीं ढेर हो गए थे ?”

सुरजीत कहने लगे, “ मैम, हमारी हैलमेट और हथियार के साथ एक यू ए वी कैमरा लगा होता है | इसकी सहायता से हम दूर के दृश्य को इस तरह देख सकते हैं जैसे सब कुछ पास ही घट रहा हो |यह ऐसा यंत्र है जो आकाश से विडिओ रेकोर्डिंग करता है और हमें रात के अँधेरे में शत्रु की पोजीशन और हरकत के विषय में बताता रहता है |”

अपनी बात को कुछ पलों के लिए रोक कर सुरजीत ने जो बताया उन शब्दों से मुझे आतंकवादियों  के प्रशिक्षण एवं उद्देश्य के साथ साथ भारतीय सैनिको की ट्रेनिंग के मूलभूत सिद्धांतों के विषय में जानकारी मिली |

सुरजीत ने कहा, “ मैंम, आतंकवादी के पास दो ही विकल्प होते हैं – या तो अपनी जान बचाते हुए निकलना या मरना | हमारे सैनिकों को तो शत्रु को मारना, अपने साथियों को बचाना, casualty को निकालना, अपनी जान की रक्षा करना- यही सभी उद्देश्य सामने होते हैं | यही तो हमारी ट्रेंनिंग के समय हमें बार बार सिखाया  और बताया जाता है |”

सुरजीत आगे की घटना के विषय में बता रहे थे, “ लगता था दुश्मन को उस सारे इलाके का पहले से ही पता था | वो अपने गाइड के साथ इस जंगल के रास्तों को देख चुका था | हमारे सामने दो मुख्य लक्ष्य थे – दुश्मन को मारना और घायल साथी कुलदीप को वहाँ से निकालना ताकि वो उनके हाथ न लग सके |”

थोड़ा सा शब्दों को विश्राम देते हुए सुरजीत ने अपने प्यारे मित्र मोहन की वीरता और साहस से भरी हुई मूरत को आँखों में भरते हुए कहा, “ मेम साब जी, दुश्मन को मारने का जोश तो हर एक सैनिक में होता है | लेकिन मोहन के अंदर देश रक्षा का और हर परिस्थिति में अपने साथियों को बचाने का जो जज़्बा था उसके उदाहरण कम ही देखने, सुनने को मिलता है |” इसे ही कहते हैं ‘बन्धुत्व’ और इसी उद्दात भावना के बल पर सैनिक भीषण परिस्थितियों में भी एक-दूसरे की सहायता करते है, रक्षा करते हैं |

उस समय सुरजीत के स्वर में मोहन का  जोश भर गया था | वो उसी के शब्द बोल रहा था , “ मैं आगे जाऊँगा साहब, छोडूँगा नहीं उन पापियों को | और वो दुश्मन पर फायर करता हुआ आगे बढ़ने लगा |हमने मोहन की ललकार सुनी --- “ छोडूँगा नहीं इन्हें आज , एक एक को मार कर ही चैन लूँगा |”

उस जंगल में घनघोर अँधेरे और सन्नाटे के सिवाय कुछ नहीं था |धीरे- धीरे थोड़ी सुबह की रोशनी होने लगी थी |  उस भीषण मुठभेड़ की अंतिम कड़ी को शब्द देते हुए सुरजीत बता रहा था, “ कुलदीप को निकालते हुए और दुश्मन की टोह लेते हुए मोहन को भी शायद गोली लग गई थी | किन्तु उसने अपनी जान की कोई परवाह नहीं की |उस आख़िरी बचे दुश्मन को मार गिराना ही उसका एक मात्र लक्ष्य था और वो अपने घायल साथी कुलदीप को भी सुरक्षित स्थान पर पहुँचाना चाहता था | मोहन और आतंकवादी अब आमने सामने थे | मोहन शत्रु से केवल 10-12 मीटर दूर था | वो उसकी ओर फायर करता हुआ आगे बढ़ता गया और फायर करते हुए उसने अंतिम आतंकवादी को भी मौत के घाट उतार दिया | इस आमने-सामने की मुठभेड़ में शत्रु ने भी मोहन पर गोली दागी और वो बुरी तरह घायल हो गया था |

 अपने प्रिय मित्र के अंतिम क्षण तो इन दोनों बहादुर कमांडो जवानों की आँखों में तैर रहे थे | फिर भी वे उन्हें बताने के लिए शब्द ढूँढ रहे थे |

सुरजीत ने कहा, “ हम जैसे ही थोड़ा आगे बढ़े तो हमें रक्त के चिह्न दिखाई दिए | हम समझ गए कि मोहन को गोली लग गई है और वो कहीं पास ही है | हमने उसे आवाज़ लगाई |  हमें पास आते देख कर वो हमसे अस्फुट स्वर में बोला, “ आज सफाया कर दिया है सालों का | वो देखो दुश्मन सामने ढेर पड़ा है | उसने अपना हथियार कस कर अपने हाथों में जकड़ रखा था जैसे ‘काम’ अभी बाकी है |

उसी पल वो भारत माँ का शूरवीर सिपाही शत्रु का पूरा सफाया करने का अपना संकल्प पूरा कर के चला गया था, बहुत दूर | उन जंगलों में माँ भारती की गोद में वो निश्चिन्त हो कर सो रहा था | अभियान में जाने से पहले उसकी सिंह जैसी ललकार सुबह के उस नीले –पीले आकाश में गूँज रही थी | कितना जोश होगा उस शूरवीर की वाणी में जब वो लक्ष्य भेदन के अपने संकल्प मन, प्राण और आँख गड़ा कर शत्रु की टोह लेता, गहन अंधेरों को चीरता आगे बढ़ रहा होगा !

 हम सब काफी देर तक मौन बैठे उस पल को अपने-अपने तरीके से जी रहे थे |अभी तक सुरजीत चुप बैठा अपने मित्र के साथ बिताए अपने 13 वर्ष के अमोल, सुखद पलों को शायद याद कर रहा था | सहसा कहने लगा, “ अपनी बेटी को बहुत प्यार करता था | उसकी फोटो उसके मोबाइल की स्क्रीन पर ही थी | कैम्प में वो मोबाइल और उसका बहुत सा सामान पड़ा हुआ था | जाने से पहले महेंद्र साहब ने उसे हँसी मजाक में कहा था, “ अपने पिट्ठू में इतना क्या-क्या भर रखा है ? तू इतना बन्दोबस्त करके, इतना सामान लेकर क्यों चलता है ?”

मोहन ने बे धड़क होकर जबाब दिया था, “ मेरी गोली मिलिटेंट का पीछा करती हुई चलती है साब | इस घुप अँधेरे में उनका पीछा करने के सारे इंस्ट्रूमेंट हैं इस बैक पैक में |”

मोहन के साहस और वीरता की कितनी कहानियाँ होंगी उसके मित्रों के पास | यह तो उस शौर्य गाथा की एक महत्वपूर्ण-अंतहीन कड़ी थी | उसकी इस वीरता के लिए राष्ट्र ने उसे ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया था | उस समय मेरे मन में एक ही विचार आ रहा था कि अगर अशोक चक्र से ऊपर और कोई भी पदक या सम्मान हो सकता है तो वो भी इस रण बाँकुरे की वीरता के लिए कम होगा|

9 पैरा स्पेशल फोर्सेस यूनिट एक पहाड़ी पर स्थित है | वहीं पर एऊँचे टीले पर अमर शहीद मोहना गोस्वामी और तीन अन्य अशोक चक्र विजाताओं की कांस्य मूर्तियाँ स्थापित है | ये केवल स्मारक नहीं, यह एक ऐसा स्मृति स्थल है जो युगों-युगों तक आने वाली पीढ़ियों को देश रक्षा के लिए सदा प्रेरित करता रहेगा | नमन ऐसे निर्भीक योद्धाओं को |

शशि पाधा