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शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

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ऊपर दिए लिंक पर मेरी रचनाएँ देखी जा सकती हैं | यह रचनाएँ hindividya.com/poems पर एकत्रित एवं प्रकाशित की गई हैं |

मंगलवार, 15 नवंबर 2016

बस यूँ ही -----7


      1

रस्ता पथरीला हो तो
मैं पगडन्डी ढूँढ लेती हूँ
चलते-चलते
प्रकृति भी हमसफर हो जाती है |

    2

अब नहीं दिखाई देती
उसकी
पहाड़ी झरने सी मुस्कान
धूप सोख गई
या
बह गई
किसी तेज़ धार में
वही जाने |

   3
 रख दिया
ताक पर
तुम्हारा दिया
अपमान, अवहेलना
 मत छूना उसे
तुम भी
कहीं
चोट ना लगे |

  5
अलगनी से
उतार लिया
अपना अतीत
ढूँढनी नहीं पड़ी
माँ की गोद
पिता का दुलार
कुछ दिन
फिर से
बच्ची हो जाऊँगी मैं |

    शशि पाधा




रविवार, 25 सितंबर 2016

भली थी

इक लड़की
कितनी 
भली थी
नाज़ बिछौने
पली थी
माँ अँगना में खेलती
जूही की
कली थी
पिता हथेली पे रखी  
 गुड़-मिश्री
डली थी
अल्हड़ हिरना झूमती
थोड़ी सी
पगली थी
भावी की गलियों में
स्वप्न संजोए
चली थी
ब्याही तो बेगाने घर
धू-धू कर
जली थी
बस इतना ही सुना कहीं  
चंगी थी
भली थी !!!!! 

शशि पाधा


मंगलवार, 20 सितंबर 2016

आज मन अधीर है

आज मन अधीर है |
काँपती कोमल धरा अब
मन में गहरी पीर है |

दिशा- दिशा में हो रहा
शोर चीत्कार आज
आँख खोलूँ तो वहीं
संहार हाहाकार आज
शान्ति के देवता के
पाँव में जंजीर है |

हरित धरा का ओढ़नी
रक्त रंजित हो गई
उठ रहा धुआं कहीं
माँग सूनी हो गई
 बह रहा हर आँख से
  वेदना का नीर है |

खिन्न विश्वास आज
छलकपट के दाँव से
इंसानियत दब रही
आसुरों के पाँव से
मातृभूमि के ह्रदय
बिंध गया इक तीर है

दिन नहीं रहे कोई
बात या संवाद के
प्रहार ही लक्ष्य और
शस्त्र हर हाथ में
शत्रु नाश जो करे
आज वही वीर है |

आज मन अधीर है !!!!!

शशि पाधा




शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

हिन्दी विश्वजीत हो

छन्द हो , गीत हो,
स्वर हो, संगीत हो
जो रचूँ , जो कहूँ
हिन्दी मन का मीत हो

भावना में तू बहे
कल्पना में तू सजे
मन के  तार तार में
प्राण वीणा सी बजे

जहाँ रहूँ , जहाँ बसूँ
हिन्दी से चिर प्रीत हो  |

स्रोत तू ज्ञान का
आधार उत्थान का
देस - परदेस में
चिह्न तू पहचान का

मन में इक साध यह  
हिन्दी विश्वजीत हो  |

परम्परा की वाहिनी
अविरल  मंदाकिनी
सुनिधि सुसहित्य की
संस्कार की प्रवाहिनी

भविष्य के विधान में
हिन्दी ही  रीत-नीत हो |
नक्षत्रों के पार भी
ध्वज तेरा फहराएँगे
धरा से आसमान तक
ज्योत हम जलाएँगे

हर दिशा, हर छोर में
सूर्य सी  उदीप्त हो |

हिन्दी विश्वजीत जीत हो !!

शशि पाधा 




बुधवार, 24 अगस्त 2016

मित्रों, कृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर प्रस्तुत है एक रचना -----

        बंसी भाग भरी

कन्हैया तोरी बंसी भाग भरी
 निसिदिन तेरे सँग जिये वो
 जब से अधर धरी ।

वृन्दावन की कुंज गलिन में
गोपिन रास रचाई
सात सुरों में गूँजे बंसी
 झूमें कृष्ण कन्हाई

 देखे रीझे मैया यशोदा
 नयनन नेह झरी  ।

छू के बंसी राधे बोली
तू किसना अति प्यारी
श्वास- श्वास में तेरो बसते
मैं तुझसे ही हारी

किस डोरी से बाँधे तूने
पूछत पहर- घरी


राधे-राधे गाए बंसी
कान्हा हिय हरषाय
मेरे मन की बूझी तूने
पुनि पुनि गीत सुनाय

तेरे सुर की राग -रागिनी
 बाँधे प्रीत -लड़ी

कन्हैया तोरी बंसी भाग भरी ।

शशि पाधा

बुधवार, 6 जनवरी 2016

नव वर्ष की शुभकामनाओं सहित ----

गुर मन्त्र

आशीषों से भरी पिटारी
उम्मीदों की गठरी भारी
जाते-जाते मेरे द्वारे
छोड़ गया था बीता साल |

इक पुड़िया में बंधे संकल्प
दूजे में निष्ठा विश्वास
तीजी में बाँधा था धीर
चौथी पुड़िया में सुख-हास
       हर गिरह में रक्ष रोली
       बाँध गया था बीता साल |

कुछ थी कल के मीठी यादें
कड़वी रखना भूल गया था
जीवन पथ में फूल बिछ कर
बीन के सारे शूल गया था

 अंगना में खुशियों के बीज
  रोप गया था बीता साल |

ज्ञान नहीं, उपदेश नहीं था
पाती में ताकीद लिखी थी
नींव पुरानी, भवन नया हो
भावी सुख की सीख लिखी थी

     गुरमन्त्र समझौतों का
    सिखा गया था बीता कल |

शशि पाधा , २२ दिसंबर २०१५

   

बुधवार, 18 नवंबर 2015

बस यूँ ही -----

क्षणिकाएँ 
    1
टूट गया बाँध
सब्र का
बह गया पानी
पर कोई नहीं डूबा
ना रोने वाला
ना रुलाने वाला
और, ज़िन्दगी
यूँ ही चलती रही
किनारों पर |
  2
री पतझड़ !
थोड़ा रुक कर आना
अभी, और पहननी हैं चूड़ियाँ
डालियों ने पत्तों की
अभी , थके मांदे राही ने
ओढ़नी है छाँव
अभी, धूप ने खेलनी है
आँख मिचौली
अभी पल रहे हैं बच्चे
घोंसलों में
अभी मत आना
सुन रही हो ना ?

  3

शांत है
अभी,हवा भी
पत्तों ने भी
अभी, रंग नहीं बदला
काँपी नहीं हैं डालियाँ
अभी
फिर क्यों है
मन में
पतझड़ी आभास |

  शशि पाधा


गुरुवार, 5 नवंबर 2015

बस यूँ ही



  
  क्षणिकाएँ


1
चलिए छोड़ देते हैं
उन्हें कुछ कहना
उनसे कही बात
तैरती है हवा में
 सुन लेती हैं दिशाएं
 बरस जाती है बदली,
और वो बड़ी
मासूमियत से पूछते हैं
तुमने मुझसे कुछ कहा  ?
 
    2

आज रात
नींद की क्यारी में
बो दिए कुछ सपने
कल देखेंगे
किस रंग के फूल उगेंगे
या फिर ----

 3

हवाओं ने कहा
चलो, मेरे साथ
वहाँ ना कोई
सीमाएँ होंगी
ना दहलीज
ना  दीवारें
ना अनुमति
ना अनुमोदन
और ना कोई
अवहेलना
बस, वहीं बस जाना

   4

पत्ती से गिरी थी ओस
बहुत नाज़ था उसे
हीरा बनने का
क्षण भंगुरता से
उसकी पहचान जो ना थी |
   5

आज पत्ते
कुछ पीले पड़ गए
कल सुर्ख हो जाएंगे
हवा को पसंद नहीं उनका
रंग बदलना
उड़ा ले जाएगी |

  6

संदली धूप
चुपचाप
आ बैठी मेरी खिड़की पर
आज नहीं मिल पाऊँगी, सखि
अन्धेरा
अभी भी बैठा है
मन के किसी कोने में



  शशि पाधा , 5 नवम्बर २०१५ 

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

दीपावली की शुभकामनाएँ - आप सब स्नेही मित्रों को

इस दीवाली
इस दीवाली दीप माल में
प्रेम का दीप जलाना मीता
हर घर में उजियारा छाए
ऐसी लौ जलाना मीता |

दीपों की लड़ियों में हम तुम
धूप किरन को गूँथेंगे
झिलमिल तारों की लड़ियों को
कंदीलों में बुन लेंगे
परहित जलती सूरज ज्योति
धरती पर ले आना मीता |
दीप वही जलाना मीता |

वैर- द्वेष की लाँघ दीवारें
मिलजुल पर्व मनायेंगे
हर देहरी रंगोली होगी
मंगल कलश सजायेंगे
नीले अम्बर की बदली से
नेह गगरी भर लाना मीता |
अँगना में बरसाना मीता |

चलो कहीं विश्वास जगा कर
अधरों पे मुस्कान धरें
चलो कहीं बाँटें फुलझड़ियाँ
मिश्री मेवे थाल भरें
आज किसी खाली झोली को
खुशियों से भर जाना मीता
ऐसा पर्व मनाना मीता |
शशि पाधा
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