रविवार, 21 जून 2015

मानस मंथन से------

      सृजन

जब रिमझिम हो बरसात
और भीगें डाल औ पात
जब तितली रंग ले अंग
और फूल खिलें सतरंग
  जब कण –कण महके प्रीत
  तब शब्द रचेंगे गीत |

जब नभ पे हँसता चाँद
ओंर तारे भरते माँग
जब पवन चले पुरवाई
हर दिशा सजे अरुणाई

जब मन छेड़े संगीत
तब शब्द लिखेंगे गीत |

जब पंछी करें किलोल
और लहरों में हिलोल
जब धरती अम्बर झूमें
और भँवरे कलिका चूमें
  जब बंधन की हो रीत
  तब शब्द बुनेंगे गीत |

जब कोकिल मिश्री घोले
पपिहारा पिहु-पिहु बोले
 वासन्ती पाहुन आए
नयनों से नेह बरसाए
   जब संग चले मनमीत
   तब शब्द बनेंगे गीत |


 शशि पाधा 

शुक्रवार, 19 जून 2015


पारिजात से ------

तुम क्यों रोए पारिजात

मैं तो रोई पीर विरह में
तुम क्यों रोए पारिजात ?

दिन के पंथी से क्या तेरा
मुझसा ही कोई रिश्ता नाता
धूप किरन की स्वर्ण लड़ी से
बाँध तुझे भी रोज़ लुभाता
  वो ना जाने प्रीति रीति
  ठगी गई मैं सारी रात
  ठगा तुम्हें भी पारिजात ?

आँचल बाँधूं फूल पंखुड़ी
नयना अम्बर ओर जड़े  
ओढूँ, पहनूँ तेरी खुशबू
जाने कब संकेत करे
  
झर झर झोली भर दी तूने
भली लगी तेरी सौगात
धीर बंधाना पारिजात |

अता पता ना मिला संदेसा
चन्दा भी मुख मोड़ खड़ा
नभ गलियों में जाके मीता  
उसे ढूँढना आज ज़रा

    तू तो जाने रोग औषधि
    तू ही जाने मन की बात
      रोग मिटाना पारिजात |


  शशि पाधा


सोमवार, 15 जून 2015

अँगना बेला महक गया

बगिया क्यारी हुई सुवास
अँगना बेला महक गया

पी कर खुशबू पवन झकोरा
बौराया सा डोले
गीतों की गुंजन में भँवरा
प्रेम पिटारी खोले
गुनगुन सा मृदुहास
अँगना बेला चहक गया

चुन चुन कलियाँ मालिन गूँथे
कँगना, झूमर, गजरा
दर्पण देखे रूप, लजाए
नयनन आँजे कजरा
तन-मन था मधुमास
वेणी बेला लहक गया

जूही चम्पा रजनी गंधा
गुपचुप करतीं बातें
कौन हाट से लाई खुशबू
मोती सी सौगातें
पूनो छिटके हास
भीगा, बेला दहक गया

- शशि पाधा
१५ जून २०१५

गुरुवार, 4 जून 2015

क्या तुम आए 

अम्बर की गलियों में आज
कण कण पिघली श्वेत चांदनी       
  क्या तुम आए?

मुक्ताहल सी तारक लड़ियाँ
बाँध रही नीलम सी साँझ
नील घटा सा श्यामल अंजन
आँज रही दुल्हन सी साँझ


कहीं दूर से पुरवाई ने
छेड़ी मीठी राग -रागिनी
  क्या तुम आए?


चन्दन की खुश्बू में लिपटी
पाती  कोई आई थी
श्वास-श्वास में मीठी सिरहन
क्या संदेसा लाई थी

मंद हवा में धीमे धीमे
लहराया था छोर बाँधनी
क्या तुम आये?


चुपके चुपके आकर किसने
आँचल मेरा थाम लिया
न देखूँ, पर फिर भी लगता
तूने मेरा नाम लिया

दूर क्षितिज की देहरी पर
हँस दी कोई रेख दामिनी

क्या तुम आए?

आज लजीली रजनी गंधा
कुछ सिमटी, सकुचाई सी
निशीतारों की मद्धिम लौ में
देखी इक परछाईं सी

मन अंगना में हौले हौले
मुसकाई थी मिलन यामिनी
क्या तुम आए?


शशि पाधा   अगस्त २०१०



बुधवार, 8 अप्रैल 2015


                      अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन, न्यू जर्सी -3 अप्रैल - 5 अप्रैल 2015 

न्यू यॉर्क के भारतीय कौंसुलावास की भागीदारी के साथ हिंदी संगम प्रतिष्ठान और न्यू जर्सी के रटगर्स विश्वविद्यालय के तत्वावधान में हिंदी शिक्षकों, विद्यार्थियों, अभिभावकों और पेशेवर हिंदी प्रेमियों के सक्रिय सहयोग से 3 से 5 अप्रैल, 2015  रटगर्स विश्वविद्यालय परिसर में द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मलेन का सफल आयोजन किया गया |   हिंदी का बढ़ता संसार: संभावनाएं और चुनौतियाँ इस सम्मेलन का मुख्य विषय था |
सम्मलेन में  भारत एवं विभिन्न देशों से आए शिक्षकों,अमेरिका के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों के अतिरिक्त व्यापार और उद्योग क्षेत्रों के प्रतिनिधियों  तथा हिंदी शिक्षण से जुड़े अनेक भाषाविदों ने भाग लिया | भाष शिक्षण पर आधारित मुख्य सत्रोंमें स्टार्टटॉक शिक्ष्ण पद्धति के  अतिरिक्त 'सार्वजनिक माध्यमों जैसे फिल्म, टेलीविजन, और वेबसाइट पर हिंदी भाषा का सार्थक प्रयोग' पर  चर्चा की गई |
अप्रैल 3 की शाम  के रंगारंग कार्यक्रम में  कुचिपुड़ी , कत्थक  एवं बॉलीवुड के गानों पर आधारित नृत्य प्रदर्शन  ने सब का मन मोह लिया | 4 अप्रैल की शाम काव्य गोष्ठी की आयोजन हुआ जिसमें देश विदेश से आए कवियों ने भाग लिया | 5 अप्रैल को  शिक्षण से जुड़े शिक्षकों ने शिक्षण में टैक्नोलोजी की सहायता, भाषा अध्ययन के माध्यम से विदेशी विद्यार्थियों को भारत की संस्कृति से परिचित कराने के उद्देश्य  आदि विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत किये |

 इस आयोजन की विशेष बात थी कि  रटगर्स विश्विद्यालय के विद्यार्थियों ने  इस सम्मेलन  की सफलता के लिए अथक परिश्रम किया | हिन्दी संस्थान प्रतिस्थान  के अध्यक्ष श्री अशोक ओझा , रटगर्स विश्विद्यालय की प्राध्यापिका शाहीन प्रवीण एवं इस आयोजन से जुडी  अन्य स्वयं  सेवी संस्थाए इस की सफलता के लिए बधाई  के पात्र हैं |

शशि पाधा 



मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

मेरी प्रिय रचना




 मैं तुझे पहचान लूँगी


लाख ओढ़ो तुम हवाएँ
ढाँप दो सारी दिशाएँ
बादलों की नाव से  
मैं तुम्हरा नाम लूंगी 
रश्मियों की ओट में भी
मैं तुझे पहचान लूंगी |

रात तारों का चमकना
या कोई संकेत तेरा
मुस्कुराती चाँदनी सब
खोल देगी भेद तेरा

जुगनुओं की ज्योत थाम
मैं तुझे आह्वान दूँगी
भोर के झुटपुटे में
मैं तुझे पहचान लूँगी |

रेत कण पर बूँद सावन
या सुनी पदचाप तेरी
मिलन के आभास में ही
काँपती है देह मेरी





हो अमा की रात कोई
नयनदीप दान दूँगी
नभ की नीली नीलिमा में  
मैं तुझे पहचान लूँगी |

लौट आओ चिर पथिक तुम
ढूँढने की रीत  छोड़ो
बीच धार नाव तेरी
थाम लो पतवार, मोड़ो

राग छेड़ें जल तरंगें
मैं तुझे निज गान दूँगी
लहर के उल्लास में
मैं तुझे पहचान लूँगी |

शशि पाधा -