गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

बहुत दिनों से सूर्य देव के दर्शन नहीं हुए , सोचा जा कर उन्हें मना लें | क्या आप भी संग चलेंगे ?

      सूरज के घर

चलो हम सूरज के घर जाएँ !
कितने दिन से उसे ना देखा
जाकर उसे मनाएँ |
चलो ना , सूरज के घर जाएँ |

तीज त्योहारों मे हर कोई
अपनों के घर जाता है
उपहारों की मीठी डलिया
भेंट रूप ले जाता है |
  धरती की कुछ न्यारी चीज़ें
  भर लें अपनी झोली
  भेंट रूप जो पाई गठरी  
  कभी किसी ने तोली ?

नदिया से कुछ लहरें ले लें 
 तरुवर से कुछ छाँव
झरनों की झाँझर छनकाएँ
पवन को बाँधें पाँव |

भँवरों से लें मीठी गुंजन
कोयल से मधु गीत
चन्दन छिटकें उपहारों पर
छिटकें मन की प्रीत

फूलों से लें भीनी खुश्बू
बागों से लें कलियाँ
तितली से रंगों की पुड़िया
जुगनू की सत लड़ियाँ

आज रात जब सूरज सोये
सब कर लें तैयारी
प्रेम की सब सौगातें बाँधें
गठरी बाँधें न्यारी

ओढ़ घटा की नीली चूनर
पंछी से उड़ जाएँ
चन्दा की इक नाव बनाएँ
नभ सागर तर जाएँ

भोर होने के पहले ही हम
पहुँचें उसके द्वार
आँख खुले जब सूरज की
तब भेंट करें उपहार

गले लगें तपते सूरज के
कुछ तो ठंडक दे दें
रंग भरी गगरी छलकाएँ
प्रेम की होली खेलें

युगों युगों से तपता सूरज
तन अपना पिघलाता
बदले में ना माँगे कुछ भी
अद्भुत रीत निभाता

जीवन में इक बार कभी तो
ऐसा कुछ कर जाएँ
जीवन दाता ज्योति पुंज का
कुछ तो ऋण चुकताएँ
   चलो हम सूरज के घर जाएँ
  चलो ना सूरज के घर जाएँ |

शशि पाधा



रविवार, 10 जनवरी 2016

आज विश्व हिन्दी दिवस पर अपनी एक प्रिय रचना ----

हिन्दी विश्वजीत हो

छन्द हो , गीत हो,
स्वर हो, संगीत हो
जो रचूँ , जो कहूँ
हिन्दी मन का मीत हो

भावना में तू बहे
कल्पना में तू सजे
मन के  तार तार में
प्राण वीणा सी बजे

जहाँ रहूँ , जहाँ बसूँ
हिन्दी से चिर प्रीत हो  |

स्रोत तू ज्ञान का
आधार उत्थान का
देस - परदेस में
चिह्न तू पहचान का

मन में इक साध यह  
हिन्दी विश्वजीत हो  |

परम्परा की वाहिनी
अविरल  मंदाकिनी
सुनिधि सुसहित्य की
संस्कार की प्रवाहिनी

भविष्य के विधान में
हिन्दी ही  रीत-नीत हो |
नक्षत्रों के पार भी
ध्वज तेरा फहराएँगे
धरा से आसमान तक
ज्योत हम जलाएँगे

हर दिशा, हर छोर में
सूर्य सी  उदीप्त हो |

हिन्दी विश्वजीत जीत हो !!


बुधवार, 6 जनवरी 2016

कभी कभी लेखनी भी रूठ जाती है ----

मौन क्यूँ हैं शब्द सारे |
मौन क्यूँ हैं शब्द सारे
पतझरी सी कल्पना है
झर गए हैं अर्थ सारे |

अब नहीं पुकारती
पर्वतों की श्रेणियाँ
मन को नहीं बाँधती
मालती की वेणियाँ
 मूक-जड़ लेखनी
 भाव हैं नि:शब्द सारे |
          
भूत –अनुभूत किसी  
कन्दरा में सो गया
हर्ष-उल्लास का  
वेग कहीं खो गया
 सूनी मन की वीथियाँ
  पट–द्वार बंद सारे |

अनकही-अनछुई
बात यूँ ही रह गई
वेदना - संवेदना
क्षार सी बह गई
नाद–अनुनाद सब
हो गए हैं मंद सारे |

  गीत मल्हार के
   बादलों से माँग लूँ
   सुरमयी साँझ को
    आँख में आँज लूँ
      कोकिला से सीख लूँ
      रागिनी के छंद सारे |

किस ओट जा खड़ी
   रेशमी बहार अब
    कब लौट आएगी
     मरमरी फुहार अब
      छिपी कहाँ है चेतना  
       पूछते दिगंत सारे|

शशि पाधा 

नव वर्ष की पूर्व संध्या पर जाते वर्ष से संवाद

  सरक गया इक और बरस
बरती सावधानियाँ
 भूली सब नादानियाँ
 रूठे और मनाते खुद को  
बीत गया एक और बरस |
कभी कहीं पंछी सा चहका
कभी कहीं चुपचाप चला
जाने कितनी बाजी जीती
बहुतेरा तो गया छला
खोने-पाने की गिनती में  
सरक गया इक और बरस |
बड़ी सूझ से, बड़ी बूझ से
नया पुराना छाँट गया  
बरसों का जो धरा–सहेजा
जाते- जाते बाँट गया
मोह माया का दरिया गहरा
लाँघ गया इक और बरस |

खुद की हिम्मत, खुद का धीर
कानों में कुछ बोल गया
काँधे हाथ धरे, कुछ ठिठका 
देहरी पर कुछ डोल गया
नेग-शगुन का सिक्का मुट्ठी  
डाल गया एक और बरस |

शशि पाधा, 28 दिसम्बर 2015    






नव वर्ष की शुभकामनाओं सहित ----

गुर मन्त्र

आशीषों से भरी पिटारी
उम्मीदों की गठरी भारी
जाते-जाते मेरे द्वारे
छोड़ गया था बीता साल |

इक पुड़िया में बंधे संकल्प
दूजे में निष्ठा विश्वास
तीजी में बाँधा था धीर
चौथी पुड़िया में सुख-हास
       हर गिरह में रक्ष रोली
       बाँध गया था बीता साल |

कुछ थी कल के मीठी यादें
कड़वी रखना भूल गया था
जीवन पथ में फूल बिछ कर
बीन के सारे शूल गया था

 अंगना में खुशियों के बीज
  रोप गया था बीता साल |

ज्ञान नहीं, उपदेश नहीं था
पाती में ताकीद लिखी थी
नींव पुरानी, भवन नया हो
भावी सुख की सीख लिखी थी

     गुरमन्त्र समझौतों का
    सिखा गया था बीता कल |

शशि पाधा , २२ दिसंबर २०१५

   

बुधवार, 18 नवंबर 2015

बस यूँ ही -----

क्षणिकाएँ 
    1
टूट गया बाँध
सब्र का
बह गया पानी
पर कोई नहीं डूबा
ना रोने वाला
ना रुलाने वाला
और, ज़िन्दगी
यूँ ही चलती रही
किनारों पर |
  2
री पतझड़ !
थोड़ा रुक कर आना
अभी, और पहननी हैं चूड़ियाँ
डालियों ने पत्तों की
अभी , थके मांदे राही ने
ओढ़नी है छाँव
अभी, धूप ने खेलनी है
आँख मिचौली
अभी पल रहे हैं बच्चे
घोंसलों में
अभी मत आना
सुन रही हो ना ?

  3

शांत है
अभी,हवा भी
पत्तों ने भी
अभी, रंग नहीं बदला
काँपी नहीं हैं डालियाँ
अभी
फिर क्यों है
मन में
पतझड़ी आभास |

  शशि पाधा


गुरुवार, 5 नवंबर 2015

बस यूँ ही



  
  क्षणिकाएँ


1
चलिए छोड़ देते हैं
उन्हें कुछ कहना
उनसे कही बात
तैरती है हवा में
 सुन लेती हैं दिशाएं
 बरस जाती है बदली,
और वो बड़ी
मासूमियत से पूछते हैं
तुमने मुझसे कुछ कहा  ?
 
    2

आज रात
नींद की क्यारी में
बो दिए कुछ सपने
कल देखेंगे
किस रंग के फूल उगेंगे
या फिर ----

 3

हवाओं ने कहा
चलो, मेरे साथ
वहाँ ना कोई
सीमाएँ होंगी
ना दहलीज
ना  दीवारें
ना अनुमति
ना अनुमोदन
और ना कोई
अवहेलना
बस, वहीं बस जाना

   4

पत्ती से गिरी थी ओस
बहुत नाज़ था उसे
हीरा बनने का
क्षण भंगुरता से
उसकी पहचान जो ना थी |
   5

आज पत्ते
कुछ पीले पड़ गए
कल सुर्ख हो जाएंगे
हवा को पसंद नहीं उनका
रंग बदलना
उड़ा ले जाएगी |

  6

संदली धूप
चुपचाप
आ बैठी मेरी खिड़की पर
आज नहीं मिल पाऊँगी, सखि
अन्धेरा
अभी भी बैठा है
मन के किसी कोने में



  शशि पाधा , 5 नवम्बर २०१५