मंगलवार, 20 सितंबर 2016

आज मन अधीर है

आज मन अधीर है |
काँपती कोमल धरा अब
मन में गहरी पीर है |

दिशा- दिशा में हो रहा
शोर चीत्कार आज
आँख खोलूँ तो वहीं
संहार हाहाकार आज
शान्ति के देवता के
पाँव में जंजीर है |

हरित धरा का ओढ़नी
रक्त रंजित हो गई
उठ रहा धुआं कहीं
माँग सूनी हो गई
 बह रहा हर आँख से
  वेदना का नीर है |

खिन्न विश्वास आज
छलकपट के दाँव से
इंसानियत दब रही
आसुरों के पाँव से
मातृभूमि के ह्रदय
बिंध गया इक तीर है

दिन नहीं रहे कोई
बात या संवाद के
प्रहार ही लक्ष्य और
शस्त्र हर हाथ में
शत्रु नाश जो करे
आज वही वीर है |

आज मन अधीर है !!!!!

शशि पाधा




शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

हिन्दी विश्वजीत हो

छन्द हो , गीत हो,
स्वर हो, संगीत हो
जो रचूँ , जो कहूँ
हिन्दी मन का मीत हो

भावना में तू बहे
कल्पना में तू सजे
मन के  तार तार में
प्राण वीणा सी बजे

जहाँ रहूँ , जहाँ बसूँ
हिन्दी से चिर प्रीत हो  |

स्रोत तू ज्ञान का
आधार उत्थान का
देस - परदेस में
चिह्न तू पहचान का

मन में इक साध यह  
हिन्दी विश्वजीत हो  |

परम्परा की वाहिनी
अविरल  मंदाकिनी
सुनिधि सुसहित्य की
संस्कार की प्रवाहिनी

भविष्य के विधान में
हिन्दी ही  रीत-नीत हो |
नक्षत्रों के पार भी
ध्वज तेरा फहराएँगे
धरा से आसमान तक
ज्योत हम जलाएँगे

हर दिशा, हर छोर में
सूर्य सी  उदीप्त हो |

हिन्दी विश्वजीत जीत हो !!

शशि पाधा 




नवगीत

गर्मी के दिन

कुछ अलसाये
कुछ कुम्हलाये
आम्रगन्ध भीजे, बौराये
काटे ना
कटते ये पल छिन
निठुर बड़े हैं गर्मी के दिन
धूप-छाँव
अँगना में खेलें
कोमल कलियाँ पावक झेलें
उन्नींदी
अँखियां विहगों की
पात-पात में झपकी ले लें
रात बिताई
घड़ियां गिन-गिन
 बीतें ना कुन्दन से ये दिन

मुर्झाया
धरती का आनन
झुलस गये वन उपवन कानन
क्षीण हुई
नदिया की धारा
लहर- लहर
में उठता क्रन्दन
कब लौटेगा बैरी सावन
अगन लगायें गर्मी के दिन।
सुलग- सुलग
अधरों से झरतीं
विरहन के गीतों की कड़ियाँ
तारों से पूछें दो नयना
रूठ गई
क्यों नींद की परियाँ
भरी दोपहरी
सिहरे तन-मन
दहक गए अंगारों से दिन |


शशि पाधा


गुरुवार, 15 सितंबर 2016

तस्वीरें बोलती हैं -----




तस्वीरें बोलती हैं ------                     

वर्ष 1965 में भारत – पाक  युद्ध चल रहा था | मेरे पति उस समय अपनी यूनिट के साथ अमृतसर –लाहौर सीमा पर तैनात थे | 20 दिन के घमासान युद्ध के बाद भारतीय सेना ने पाकिस्तान का बहुत सा क्षेत्र जीत लिया था | इच्छोगिल नहर पर बसा हुआ बरकी गाँव लाहौर से लगभग 13/14 किलोमीटर दूर था और युद्ध के समय भारतीय सेना वहाँ तक पहुँच गई थी | अब यह क्षेत्र और इसके आस पास के क्षेत्र भारतीय सेना के अधीन थे | युद्ध अपने पूरे वेग पर था | इस गाँव के निवासी अपनी सुरक्षा के लिए गाँव छोड़ कर किन्हीं सुरक्षित स्थानों की ओर चले गए थे | किन्तु कुछ बूढ़े और असहाय निवासी अपना गाँव छोड़ कर नहीं जाना चाहते थे | २३ सितम्बर को युद्ध विराम की घोषणा भी हो गई थी | अब बरकी गाँव के बचे-खुचे निवासी भारतीय सेना के मेहमान थे | भारतीय सैनिक उनकी सेवा करते, दवा दारू देते और हर परिस्थिति में उनकी सहायता कर रहे थे | इस तस्वीर में बंद वृद्ध दम्पति किसी भी हालत में अपना गाँव छोड़ कर नहीं जाना चाहते थे | वृद्ध पुरुष का नाम था चिरागदीन | उनकी पत्नी काफी अस्वस्थ थीं और  वो कहीं जाने में असमर्थ थीं | उन्हें शायद शान्ति की उम्मीद भी थी |
एक दिन मेरे पति इस दम्पति से बातचीत कर रहे थे कि उस  वृद्ध पुरुष ने इन्हें बताया कि उसका जन्म पंजाब के जालन्धर जिले के किसी गाँव में हुआ था | उसे अपने जन्मस्थान की, अपने बचपन के घर की बहुत याद सताती रहती है | यह बात कहते हुए मेरे पति ने देखा कि उस वृद्ध की ऑंखें अश्रुपूर्ण थी | आते -आते इन्होने जब उससे पूछा कि क्या उन्हें किसी चीज़ की ज़रुरत है तो उसने हाथ जोड़ कर कहा,” साहब , आप मुझे एक बार मेरे गाँव में ले जाइए | मैं मरने से पहले अपना जन्म स्थान देखना  चाहता हूँ |”  उसकी इच्छा पूरी करने में कुछ कठिनाइयाँ तो थी किन्तु मेरे सहृदय पति ने एक दिन उसे  एक फौजी जेकेट पहनाई, गाड़ी में बिठाया और ले गए उसे उसके  गाँव | उस  पाकिस्तानी वृद्ध की खुशियों का विवरण तो मैं शब्दों में  नहीं दे सकती | आप केवल उसे महसूस कर सकते हैं | वापिस आकर जब मेरे पति ने उनसे विदा ली तो उसने  दोनों हाथ आसमान की ओर उठा कर इन्हें दीर्घ आयु का आशीर्वाद दिया |
लगभग छह महीनों के बाद ताशकंद समझौते के बाद भारतीय सेना को यह क्षेत्र पाकिस्तान को वापिस लौटाना था | मेरे पति इस वृद्ध दम्पति से मिलने गए | उन्होंने इन्हें बड़े स्नेह से गले लगाया, तस्वीर लेने को कहा और साथ में भेंट किया एक मिट्टी का कटोरा और कुरान शरीफ की एक प्रति | विदा के समय दोनों की आँखें नम थीं |

अब आप ही बताएँ कि इस युद्ध मे किसकी हार –किसकी जीत  ?????

शशि पाधा 

बुधवार, 14 सितंबर 2016

एक हाइबन -----

-अमूल्य उपहार
शशि पाधा
वो नन्हें-नन्हें पाँव बढ़ाता, धीमे-धीमे चल रहा था । उसके होठों की मुस्कान एवं आँखों की चमक में कुछ रहस्य छिपा था ।अब वो थोड़ा पास आ गया था । मैंने देखा कि उसके नन्हें-नन्हें,कोमल हाथों में तीन शाखों वाली कुछ लंबी सी दूर्वा (हरी घास) धीमे-धीमे डोल रही थी ।
मैं उसे कुछ दूर से बड़ी उत्सुकता से देख रही थी और सोच रही थी कि वो उस टहनीनुमा घास को लेकर कहाँ जा रहा था । अरे, वो तो मेरी ओर ही आ रहा था । अपने दायें हाथ में घास की उस छोटी -सी दूर्वा को उठाकर वो ऐसे चल रहा था ,मानों सुमेरु पर्वत का भार वहन कर रहा हो ।
मेरे पास आते ही उसकी आँखों की चमक चौगुनी हो गई और मुस्कान उसके कोमल होठों से उसके कानों तक एकरस हो गई । मैं भी चुपचाप उसे देख रही थी कि आखिर वो क्या करने जा रहा है, कहाँ जा रहा है ।
मेरे पास पहुँचते ही उसने मुस्काते हुए दूर्वा को मेरी और बढ़ाया और कहा-“दादी, आपके लिए फूल !”
‘वो’ मेरा पौने तीन वर्ष का पोता ‘शिवी’ है और उस अमोल उपहार को पाकर गद्गद होने वाली उसकी दादी मैं , आपकी दोस्त |
निर्मल मन
अमूल्य उपहार
भीगे नयन ।
इस रचना को आप नीचे दिए गए लिंक पर भी पढ़ सकते हैं | आभार सम्पादक द्वय |
शशि पाधा
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बुधवार, 24 अगस्त 2016

मित्रों, कृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर प्रस्तुत है एक रचना -----

        बंसी भाग भरी

कन्हैया तोरी बंसी भाग भरी
 निसिदिन तेरे सँग जिये वो
 जब से अधर धरी ।

वृन्दावन की कुंज गलिन में
गोपिन रास रचाई
सात सुरों में गूँजे बंसी
 झूमें कृष्ण कन्हाई

 देखे रीझे मैया यशोदा
 नयनन नेह झरी  ।

छू के बंसी राधे बोली
तू किसना अति प्यारी
श्वास- श्वास में तेरो बसते
मैं तुझसे ही हारी

किस डोरी से बाँधे तूने
पूछत पहर- घरी


राधे-राधे गाए बंसी
कान्हा हिय हरषाय
मेरे मन की बूझी तूने
पुनि पुनि गीत सुनाय

तेरे सुर की राग -रागिनी
 बाँधे प्रीत -लड़ी

कन्हैया तोरी बंसी भाग भरी ।

शशि पाधा

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

आज अमेरिका में सदी का सब से भयंकर हिम का तूफान आया | लगभग 3 फुट बर्फ ने धरती को ढाँप दिया ---

 मोती जड़ी सी ओढ़नी
           
ओढ़ ली धरा ने रात
मोतियों की ओढ़नी
मुग्ध चाँद देखता
चाँदनी सी मोहिनी |

बंध गई हैं डार से
हिम की श्वेत झालरें
कर्णफूल –झुमकियाँ
चाँदी गढ़ी सी झाँझरें
   सजी, खिल-खिला रही  
   मोद में मोदिनी |

झुक रही हैं डालियाँ
सौन्दर्य के भार से
आज शीत ऋतु की
होड़ है बहार से
 स्तब्ध ऋतुराज भी
   देख आभ शोभिनी |

बरस रही हैं बून्दियाँ
हरशृंगार झर रहे 
सूर्य ओट में खड़े
हाथ क्यों मल रहे
  विरहणी वसुंधरा
   हो गई है योगिनी |


  शशि पाधा,  जनवरी २०१६