मंगलवार, 5 सितंबर 2017

                      वीर स्थली का सिंह नाद

                          संस्मरण 

1 जुलाई, 2016 को भारतीय सेना की एक महत्वपूर्ण पलटन 9 पैरा स्पेशल फोर्सेस अपना 50वाँ स्थापना दिवस बड़े उत्साह और गर्व के साथ मना रही थी | सेना से सेवा निवृत हुए बहुत से अधिकारी भी सपरिवार इस महाकुम्भ में भाग लेने के लिए देश- विदेश से आए हुए थे | धर्म स्थल पर सामूहिक पूजा-अर्चना, सामूहिक बड़ा खाना, मैस में प्रीति भोज, और भी न जाने कितने कार्यक्रमों में यह तीन दिन कैसे बीते, पता ही नहीं चला | कुछ लोग अपने कैमरे में इन मधुर स्मृतियों को सदा के लिए कैद कर रहे थे और कुछ विडिओ रिकॉर्डिंग में | और, मैं वहाँ से अपने मानस पटल पर जो अविस्मरणीय चित्र उकेर कर लाई उसे आपके सामने प्रस्तुत करते हुए मुझे जिस रोमांच, गर्व, ममता, कृतज्ञता और श्रद्धा की मिलीजुली भावना ने घेर रखा है, उसे शब्दों में बाँध पाना मेरे लिए असाध्य कार्य है |
मेरा इस पलटन के साथ भावनात्मक सम्बन्ध है | १९६५ के भारत-पाक युद्ध के बाद ‘मेघदूत फ़ोर्स’ के नाम से इस पलटन की स्थापना हुई थी | मैंने भी लगभग 5 दशक पहले वर्ष १९६८ में एक नई नवेली दुल्हन के रूप में सूरमाओं के इस परिवार में अपने सैनिक जीवन का पहला कदम रखा था | उन दिनों यह पलटन अपनी शैश्वावस्था में जम्मू नगर के डन्साल गाँव के पास एक पहाड़ी क्षेत्र में स्थित थी | आज यह पलटन जम्मू –कश्मीर की उधमपुर छावनी में स्थित है |

इस पलटन के मुख्य कार्यालय के ठीक सामने एक छोटा सा प्राकृतिक टीला है | वर्षों से वहाँ पर फूल आदि लगाए जाते थे | इस टीले का भूगोल यही है कि चाहे मैस में जाओ चाहे ऑफिस, चाहे खेल के मैदान में जाओ चाहे बैरकों की ओर, यूनिट में किसी ओर भी जाओ, आते–जाते इस टीले पर आपकी दृष्टि अवश्य पड़ेगी | इसी चतुर्दर्शी टीले की गौरवशाली मिट्टी की गोद में स्थापित की गई हैं इस पलटन के चार अशोक चक्र विजेता रणबाँकुरों की काँस्य मूर्तियाँ  | सिहं जैसे अप्रतिम बल के धनी यह चार शूरवीर हैं –मेजर अरुण जसरोटिया, मेजर सुधीर वालिया, लांस नायक छत्री एवं लांस नायक मोहन गोस्वामी | कश्मीर घाटी में आतंकवादियों के साथ लोहा लेते हुए इन चारों ने महाबलिदान की सर्वोच्च मिसाल कायम की है | यह चार शूरवीर केवल पलटन के लिए ही नहीं पूरे भारत के लिए अखंडता,एकता,वीरता और शौर्य की जो गाथा अपने रक्त से जिन अक्षरों में लिख कर गए हैं, उसे  युगों युगों तक इतिहास के पन्नों में पढ़ते हुए भारत वासी प्रेरित होते रहेंगे और अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते रहेंगे |  
                    
अपने जीवन के 50 वर्षों में यह पलटन अनगिन वीर चक्र, शौर्य चक्र, कीर्तिचक्र, सेना मेडल एवं कई अन्य वीरता के पदकों से विभूषित हुई है |  इस पलटन को बाह्य एवं आंतरिक युद्ध में अप्रतिम वीरता का प्रदर्शन करने के कारण पाँच बार भारतीय सेना के सेनाध्यक्ष ने यूनिट साइटेशन से सम्मानित किया | इसके साथ ही कई बार अन्य मिलिट्री कमांडरों द्वारा समय समय पर इस यूनिट को वीरता के पुरस्कारों से समानित किया गया है | हम सब के लिए यह बहुत गर्व की बात है कि इस पलटन को ‘bravest Of The Brave ‘  के गौरवशाली सम्मान से  भी विभूषित किया गया है |

स्थापना दिवस के महोत्सवों में मेरे लिए सब से महत्वपूर्ण एवं रोमंचाकरी पल थे जब इन चार महा योद्धाओं की मूर्तियों पर माल्यारोपण के लिए सभी अधिकारी, जेसीओ, सैनिक एवं उनके परिवार के सदस्य इस टीले के सामने एकत्रित हुए थे |  मेरे साथ ही खड़े थे प्रथम अशोक चक्र विजेता मेजर अरुण जसरोटिया के बड़े भाई, उनके साथ ही अपने वीर पुत्र की मूर्ति को अपलक निहार रहे थे दूसरे अशोक चक्र विजेता मेजर सुधीर कुमार के वृद्ध पिता | तीसरे अशोक चक्र विजेता लांस नायक छत्री के परिवार से तो कोई नहीं आ पाया था किन्तु पूरी पलटन उनके लिए नत मस्तक हो खड़ी थी | मेरा हाथ थामें खड़ी थी चौथे अशोक चक्र विजेता लांस नायक मोहन गोस्वामी की युवा पत्नी ‘भावना’ अपनी 8 वर्ष की बेटी ‘भूमिका’ के साथ | एक–एक करके सभी अधिकारी इन मूर्तियों पर श्रद्धा सुमन चढ़ा  रहे थे, और हम सब खड़े उन्हें अपनी मौन श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे थे |

माँ वैष्णो देवी की पहाड़ी से आती हुई सुबह की हल्की-हल्की धूप अमरत्व के चिह्न इन मूर्तियों को धीमे-धीमे सहला रही थी और उनकी शीतल-शांत परछाई छू रही थी अपने पिता को, भाई को, पत्नी को, बच्ची को और श्रद्धा में नत खड़े असंख्य सैनिकों को | अचानक मुझे लगा कि भावना के हाथ की पकड़ मेरे हाथ पर और मजबूत होती जा रही थी | कुछ महीने पहले ही वैधव्य के दारुण संसार में अपना अस्तित्व खोजती, दुबली पतली पहाड़ी लड़की भावना शायद एक बड़ी बहन के हाथों में कोई ढाढस, कोई सांत्वना कोई सहारा ढूँढ रही थी | उन महा योद्धाओं की मूर्तियों की परछाई की दिव्य उजास में मुझे आभास हुआ कि कहीं भी तो नहीं गए हैं ‘वे’ | यहीं तो हैं, धूप की गुनगुनाहट में, हवा की सुगंध में, आकाश के विस्तार में और धरती के धैर्य में | उस समय वातावरण में अपनों के खोने के दुःख की नमी भी थी और शौर्य की धूप की गरिमा भी |

समारोह के समापन के बाद मैंने उस वीर स्थली की तस्वीर ली थी |  दो दिन बाद हम सब इस वीरोत्सव की मधुर स्मृतियाँ सहेजे अपने-अपने घर लौट आए | कई दिनों के बाद जब मैंने पुन: उस तस्वीर को देखा तो मुझे लगा कि कुछ-कुछ वैसा ही मैंने कभी-कहीं पहले भी देखा है |सुधियों की पिटारी खोली तो वर्षों पहले ली गई एक तस्वीर मेरी अँखियों के सामने खुल गई | मैं लौट गई अपने अतीत में |

वर्ष १९६७ में मैं जम्मू कश्मीर विश्विद्यालय का प्रतिनिधित्व करते हुए वाद –विवाद प्रतियोगितामें भाग लेने के लिए मैं ‘बनारस हिन्दू विश्विद्यालय’ गई थी | वहीं से कुछ मील दूर सारनाथ में देखा था अशोक स्तम्भ, जिसके शीर्ष पर सुशोभित थे चार सिंह | उसके बाद इन चार सिंहों का विराट रूप देखा था राजकीय मोहर पर,राजकीय चिह्न के रूप में |भारत की एकता, अखंडता और अक्षुण्णता का सिंह नाद वर्षों से यही चार पराक्रमी- बलशाली सिंह चहुँ दिशाओं में,सात समुद्र पार,ऊँचे से ऊँचे पर्वत शिखरों की सीमाओं को लाँघ युगों युगों से करते आए हैं |

 मन की परतों में लिखे इतिहास के पन्नों को खोला तो याद आया कि ‘कलिंग’ के युद्ध के बाद मानव संहार से क्षुब्ध हुए महाराज अशोक ने धर्म परिवर्तन की घटना के स्मारक के रूप में इस स्तम्भ का निर्माण करवाया था ताकि पूरे विश्व में  अहिंसा का प्रचार–प्रसार हो सके| दोनों चित्रों को देखते हुए मेरे मन में कई प्रश्न उभरे | संसार से हिंसा की भावना को सदा के लिए मिटाना और मानव को मानव से प्रेम का संदेश देता हुआ सारनाथ स्तम्भ का सिंह चक्र उस समय जनहित के लिए विशेष उद्देश्य को ध्यान में रख कर जिन मूल कारणों के निवारण के लिए बनवाया गया था वो कारण आज भी वैसे के वैसे ही मानवता को लील रहे हैं |  संसार आज भी उसी हिंसा और संहार की अग्नि में झुलस रहा है | प्रतिदिन कई वीरों के महाबलिदान से सीमाएँ रक्त रंजित हो रही हैं और कितनी वीर नारियों की माँग का सिन्दूर उस रक्त में बह रहा है | प्रश्न वहीं खड़े हैं पाषाण स्तम्भ की तरह और हम समाधान ढूढ़ रहे हैं आतंक वाद से ग्रस्त पूरे विश्व में, चारों दिशाओं में, शिखर वार्ताओं में, और न जाने कहाँ, कब से ?

 आज 9 पैरा स्पेशल फोर्सेस की वीर स्थली पर खड़े अशोक चक्र विजेता चार महावीरों की तस्वीर सारनाथ के स्तम्भ पर अंकित सिंहों की तस्वीर का इतिहास पुन: दोहरा रही है | अगर उस समय अहिंसा के परम धर्म के प्रसार के लिए सिंह नाद हुआ था तो आज इन चारों वीरों की काँस्य मूर्तियाँ भी अपने रण घोष से पूरे भारत को उद्बोधन का संदेश दे रही हैं | मुझे पूर्ण विश्वास है कि भारत वासी इन  पराक्रमी वीरों के स्मृति स्थल पर अपना माथा टेक यह प्रण लेंगे कि जिस आतंकवाद को समूल मिटाने में इन वीरों ने अपने  प्राण उत्सर्ग किए हैं, आज का भारत उस शत्रु से लोहा लेते हुए उनके सिंह नाद को भूलेगा नहीं |एक बार फिर से  कृतज्ञ राष्ट्र विश्व शान्ति  की ज्योत प्रज्ज्वलित करके विश्व के कोने-कोने को दैदीप्यमान करेगा |


जय हिन्द –जय हिन्द की सेना |


शशि पाधा

‘(स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में’)


सोमवार, 3 जुलाई 2017

कल फिर लौट के आऊँगा ----
विदा की वेला में सूरज ने
धरती की फिर माँग सजाई,
तारक वेणी बाँध अलक में
नीली चुनरी अंग ओढ़ाई,
नयनों में भर सांझ का अंजन
हर शृंगार की सेज बिछाई,
और कहा सो जाओ प्रिय
मैं कल फिर लौट के आऊँगा।
भोर किरण कल प्रात तुझे
चूम कपोल जगाएगी
लाल ग़ुलाबी पुष्पित माला
ले द्वारे पर आएगी
पुनर्मिलन के सुख सपनों की
आस में तू शरमाएगी
उदयाचल पर खड़ा मैं देखूँ
तू कितनी सज जाएगी
पलक उठा तू मुझे देखना
किरणों में मुसकाऊँगा
मैं कल फिर लौट के आऊँगा ।
दोपहरी की धूप छाँव में
खेलेंगे हम आँख मिचौली
डाल डाल से पात पात से
छिप कर देखूँ सूरत भोली
प्रणय पुष्प की पाँखों से तब
भर दूँगा मैं तेरी झोली
दूर क्षितिज तक चलना संग
नयनों में भर ले जाऊँगा
मैं कल फिर लौट के आऊँगा ।
शशि पाधा
कितना शौक है इन्हें 
दादी का चश्मा पहनें 
पर कभी नाक छोटी 
और कभी कान 
और यह चश्मा है कि 
यह गिरा आ आ आआआ
वो गिरा आआअह्हह्हह
अब कोई बताए
क्यों बनाते हैं लोग
बड़े चश्मे
हमें सताने को ?
थोड़ा रुलाने को ?
या ----
दादी को
हंसाने को ??????


शशि पाधा 



गुरुवार, 17 नवंबर 2016

              दृश्य -पटकथा - पात्र 
                     ( संस्मरण )

(नेपथ्य से)  मेरी आवाज़ में
मेरे मध्यवर्गीय माता पिता का घर। प्रत्येक वस्तु अपने स्थान पर करीने से लगी हुई । छोटा सा आँगन,गुलाब-गेंदा आदि सभी मौसमी फूलों से शोभित छोटी सी बगिया, तुलसी का चौबारा, धूप-दीप तथा फूलों से सुगन्धित ठाकुरद्वारा, शयन कक्ष में अलमारी में साहित्यिक पुस्तकें सजी हुईं। यानी पूरा का पूरा घर साफ़ सुथरा। पिता कहते थे स्वच्छ घर में लक्ष्मी का निवास होता है । वैसे माता -पिता दोनों शिक्षक थे । अत: लक्ष्मी से अधिक सरस्वती का निवास ही था हमारा घर ।

      (दृश्य एक)  कुछ वर्षों के बाद
रिटायर्ड माता- पिता का शयन कक्ष । चारपाइयों के दोनों ओर तिपाई पर बहुत सारी पुस्तकें –पत्रिकाएँ, बिना खोल के दो-दो चश्में ( एक दूर के लिए- एक पास के लिए),  पानी पीने का चाँदी का गिलास तथा ताँबे का पानी भरा लौटा। दोनों का अपना-अपना दवाइयों का प्लास्टिक का डिब्बा। पिता जी की तरफ खिड़की की सिल पर पंचाँग, कल्याण के नये पुराने अंक, पत्र लिखने के लिये  उनके नाम का पैड, पेन | पास ही ऊनी टोपी, जुराबें हाथ- पाँव पोंछने के लिये छोटा सा तौलिया, चश्में के खोल, कुछ नये पुराने पोस्ट कार्ड आदि- आदि न जाने कितनी छोटी मोटी चीज़ें । माता जी की चारपाई के पीछे की सिल के स्थान पर बिस्तर गर्म करने के लिये रबर की पानी वाली बोतल, छोटा सा ट्राँसिस्टर, कुछ भजनों की कैसटें । शरतचन्द्र, वृन्दावन लाल वर्मा के उपन्यास , एक छोटा पर्स जिसमें यहाँ-वहाँ देने के लिये कुछ पैसे, हाथ पाँव मे दर्द के लिये लगाने वाली कोई टयूब, आदि -आदि- आदि न जाने कितनी चीज़ें । यानी उनका सारा वैभव,सारा संसार, सारी अवश्यकताएँ सिमट कर उनकी चारपाइयों के इर्द-गिर्द समा गईं । कभी कभी मुझे इतना सामान देख कर खीज आती थी तो धैर्य की मूर्ति मेरे पिता मन्द-मन्द मुस्कुरा कर कहते" सुविधा रहती है, किसी को आवाज़ नहीं देनी पड़ती "। मैं चुप रहती । वैसे भी मैं साल में एक- आध बार ही तो उनसे मिलने जाती थी , क्या फ़र्क पड़ता था ।

    ३५ वर्षों के  बाद  ( नेपथ्य से मेरी आवाज़)

अत्यन्त रोमांचक, शौर्य पूर्ण कार्यों से भरा पूरा जीवन जीने के बाद अब मेरे सैनिक अधिकारी पति रिटायर्ड हो गए हैं । बड़े-विशाल सरकारी सुसज्जित भवनों (जिनके साथ अति सुन्दर बाग -बगीचा) में ही हमारा अधिकांश जीवन बीता । उन घरों की सफ़ाई तथा देख- रेख के लिये हमारे साथ बहुत से सहायक रहते थे । यानी घर की सुई के लिये भी निश्चित स्थान । सारा घर सजा-सजाया, साफ़ सुथरा ।

 अब हम अपने बच्चों के साथ अमेरिका में रहने के लिये आ गए हैं । भरा- पूरा परिवार है, बड़ा सा घर भी है  ।
               दृश्य २ 
 हमारे शयन कक्ष में क्वीन साइज़ बेड के पास नाइट स्टैंड पर एक-एक टेबल लैम्प, दोनों की मेज पर दो-दो चश्में, ( एक पास के लिएऔर एक दूर देखने के लिए) नीचे के खुले दराज़ों में मेरी तरफ़  एक छोटी डिब्बिया जिसमें मैं रात को सोने से पहले अँगूठी आदि रखती हूँ ,वैस्लीन का जार, पीठ दर्द के लिये लगाने वाली दवाई की टयूब, फोन का चार्जर, टिशु पेपर का रोल, मेरी पूर्ण-अपूर्ण रचनाओं की डायरियाँ, कुछ नई- पुरानी हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएँ । लिखेने के पैड, पेन-पेंसिलें, पानी की बोतल, आदि-आदि-आदि न जाने छोटी-मोटी कितनी चीज़ें । एक छोटी टेबुल पर छोटा सा सी.डी सिस्टम जिसके साथ ही पड़ी रहती हैं गुलज़ार, फ़रीदा खानुम, आशा भोंसले, मुकेश, जगजीत आदि की मश्हूर सीडीज़ का संग्रह । साथ ही रखा रहता है दिन भर का साथी –मेरा लैप टॉप|

मेरे पति के टेबुल पर दो चश्में, हाथ की घड़ी, टेलीफोन के नम्बरों की डायरी । नीचे खुली दराज़ के एक खाने में दवाइयों का प्लास्टिक का डिब्बा,चश्मों के खोल, पेन और वालेट, पानी की बोतल ।
दूसरे खाने में हाथ-पाँव पोंछने का तौलिया ( क्योंकि पेपर टावल रखना उन्हें पर्यावरण के सिद्धान्तों के विरुद्ध लगता है) , एट्लस, कुछ नक्शे, कुछ नए- पुराने बिल । पास ही छोटी टेबुल पर उनकी  लैप टाप, अमेरिका की पत्रिकाएँ, विश्व के प्रसिद्ध सैनानियों की जीवनियाँ,योग ध्यान की पुस्तकें आदि,आदि आदि | यानी दिनचर्या की न जानें कितनी चीज़ें ।

 काम करते करते जब भी मुझे समय मिलता है मैं हर चीज़ झाड़ पोंछ कर करीने से अपनी -अपनी जगह रख देती हूँ । लेकिन धीरे-धीरे सब छूटता जा रहा है । बहुत कोशिश के बाद भी कमरा अस्त-व्यस्त ही लगता है ।
अब जब भी कभी रात को अपने कमरे में सोने के लिए आती हूँ तो सोचती हूँ  ---कुछ भी तो नहीं बदला | वही दृश्य, वही पटकथा | बदले हैं तो केवल पात्र ------


शशि पाधा 

मंगलवार, 15 नवंबर 2016

बस यूँ ही -----7


      1

रस्ता पथरीला हो तो
मैं पगडन्डी ढूँढ लेती हूँ
चलते-चलते
प्रकृति भी हमसफर हो जाती है |

    2

अब नहीं दिखाई देती
उसकी
पहाड़ी झरने सी मुस्कान
धूप सोख गई
या
बह गई
किसी तेज़ धार में
वही जाने |

   3
 रख दिया
ताक पर
तुम्हारा दिया
अपमान, अवहेलना
 मत छूना उसे
तुम भी
कहीं
चोट ना लगे |

  5
अलगनी से
उतार लिया
अपना अतीत
ढूँढनी नहीं पड़ी
माँ की गोद
पिता का दुलार
कुछ दिन
फिर से
बच्ची हो जाऊँगी मैं |

    शशि पाधा




बुधवार, 28 सितंबर 2016

तस्वीरें बोलती हैं --3
                                                   जिजीविषा 

अमरीका में पतझड़ द्वारे आन खड़ी  है| यहाँ  पर भारत की तरह छ: ऋतुएँ तो नहीं होती किन्तु गर्मी के बाद पतझड़ आ ही जाती है प्रकृति का नियम है , आएगी ही | पतझड़ का स्वागत यहाँ बहुत जोर शोर से होता है  | जब पत्ते रंग बदलते हैं तो इतने रंगों में रंग  जाते  हैं कि इन्हें नाम देना भी कठिन हो जाता है | खैर, पतझड़ के रंगों पर तो मैं फिर कभी लिखूँगी आज मैं एक नन्हे से फूल की जिजीविषा का कथा सूना रही हूँ |
हमारे घर में तरणताल के आसपास सुर्ख गुलाबों की एक झाड़ी है गर्मियों में इतने गुलाब खिलते हैं  कि पत्ते  भी छिप जाते हैं | फिर धीरे- धीरे मौसम बदलने लगता है और गुलाब कम होने लगते हैं पत्ते पीले पड़ने लगते हैं और झड़ने लगते हैं मैं रोज़ उनके पास जाकर मौन में विदा बोलती हूँ और कहती हूँ,"  अगली बार जल्दी आना दोस्त |"
पता नहीं वो मेरी बात सुन पाते हैं कि नहीं किन्तु मैं ठहरी परदेसिन | मुझे यह गुलाब अपने बचपन के घर की याद दिलाते हैं मुझे उनके साथ अजीब सा  मोह हो जाता है जब वो धीरे-धीरे लुप्त होने लगते हैं तो  मैं उदास हो जाती हूँ |
कल जब खिड़की से मैंने उस झाड़ी पर एक इकलौता गुलाब देखा तो मैं उसके पास चली गई| आस-पास के पत्ते कुछ हरे पर अधिकतर पीले थे | सूखी टहनियों पर काँटे अभी तक सही सलामत थे मैंने पास जाकर उस नन्हे फूल को निहारा |
देखा तो एक दो काँटे उसे चुभ रहे थे | उस कोमल फूल की  टहनी को मैंने काँटों से अलग किया | लगा, वो फिर से मुस्करा रहा था| आस पास की सूखी झाड़ और पतझड़ की हवाओं से  निश्चिन्त  वो 'जी 'रहा था --अपने आज को पूरी तरह जी  से रहा था
मैंने झट से उसकी तस्वीर ली | उस  तस्वीर को देख कर मेरेमन में एक  विचार आया | उसे मैंने  एक हाइकु के  रूप में  लिख दिया | जैसे वो कह रहा हो ---

मैं  तो खिलूँगा
अरे ओ पतझड़ 
धत तेरे की

 उसकी इस जिजीविषा के संकल्प को नमन |





शशि पाधा