शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

प्रस्तुत है एक कहानी ------

                वो कौन थी


एक पार्क की बेंच पर बैठे मैंने उसे कई बार देखा था | भारत से अमेरिका आए मुझे कुछ ही दिन हुए थे | समय काटने के लिए हर शाम मैं  घर के पास के पार्क में टहलने के लिए जाती थी | परदेस में किसी स्वदेसी को देख लेना असीम  आनन्द का कारण बन जाता है | मैं बड़ी उत्सुकता से एक –दो बार उसके पास से गुज़री कि शायद बात हो जाए,लेकिन उसने मेरी ओर देखा तक नहीं |
वो चुपचाप बैठी शून्य में अपलक ताका करती, जैसे उसमे कुछ ढूँढ रही हो | कभी  धरती पर दृष्टि गढ़ाए अपने पाँव से किन्हीं प्रश्नों के उत्तर कुरेदती रहती | कभी मौन, निश्चेष्ट बैठी रहती  |
बहुत बार इच्छा हुई कि उसके पास जाऊँ, उससे परिचय बढाऊँ या उसकी निराशा का कारण पूछूँ| किन्तु मैं उसके मौन की परिधि को लाँघने का साहस नहीं जुटा पाई |
एक बार, केवल एक बार उसने थोड़ी आत्मीयता से मेरी ओर देखा था| मुझे लगा कि वो अपने एकान्त लोक से इहलोक में आ गई हो |उसे अपनी ओर देखते हुए मैंने सोचा कि शायद उसे मेरी आवश्यकता हो, शायद मैं उसकी कोई सहायता कर सकूँ| साहस करके मैं उसके पास चली गई |मुझे सामने खड़ा देख वो एक बार चौंक सी गई |
मैंने पूछा,” क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ ?”
बिना उत्तर दिए वो थोड़ा सा खिसक गई | मुझे लगा, मना भी तो नहीं किया |
उसके पास बैंच पर बैठते हुए मैंने कहा,” मेरा नाम गरिमा है | मैं भारत से हूँ | यहाँ कुछ दिन पहले ही आई हूँ |
बिना दृष्टि उठाए उसने केवल “हूँ’ कहा| क्योंकि मैं उम्र में उससे बड़ी थी अत: उसकी निराशा देख कर मेरे मन में ममता जागृत हुई | बात बढ़ाने के लिए मैंने उससे पूछा,” बेटी,क्या नाम है तुम्हारा ?”
पहली बार उसने दृष्टी उठाई | मेरी तरफ़ नहीं, सामने फैलते अन्धकार की ओर देखते हुए उसने कहा,”मेरा नाम मंदोदरी है”|
नाम सुन कर मैं चौंक गई| मैंने रामायण में पढने के अलावा आज तक किसी का यह नाम नहीं सुना था | जिस नाम के साथ एक वेदनामय कथांश जुड़ा हो , ऐसा नाम इसके माता पिता ने इसे क्यों दिया ?
प्रश्नसूचक दृष्टि से उसकी और देखते हुए मैंने कहा, “मंदोदरी, किन्तु”?
मेरा सवाल नहीं सुना उसने | तीव्र वेग से उठती हुई वो बोली,” यह मेरा असली नाम नहीं है | मैंने अपना नाम बदल दिया है “| और तेज़ क़दमों से चलती हुई वो घिरती साँझ के अंधेरों में खो गई|
वो तो चली गई लेकिन एक प्रश्न चिन्ह मेरे लिए छोड़ गई | मैं अब शून्य से पूछ रही थी –क्या रावण अभी तक जीवित है ??????

शशि पाधा



6 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 6/10/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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  2. धन्यवाद कुलदीप ठाकुर जी |

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  3. बहुत सटीक और मर्मस्पर्शी कहानी...

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  4. कुछ न कहकर बहुतकुछ कह गई यह छोटी सी कहानी ।

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  5. प्रभावशाली लघुकथा , हार्दिक बधाई

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