सोमवार, 24 सितंबर 2012

जापानी विधा हाइकु- सेदोका -चोका में रचित कुछ रचनाएँ तथा जीवन के रंग में रंगे "महिया"

   सेदोका
1
ओढ़ी किसी ने
वसंती चुनरिया
लहँगा लहरिया
न रोके  कोई
फूलजड़ी देहरी
आ गए साँवरिया ।
2
लो तुम सुनो-
सजी स्वर  लहरी
साँसों की रुनझुन
लो तुम पढ़ो -
चितवन लिखे जो
नैनों की सरगम ।
3
तुम आओ तो
कह दें चाँदनी से
कहीं रुक न जाना
तारों की वेणी
खुली भीगी अलकें
सखि तुम सजाना !
4
किससे कहें
अधरों पे पहरे
नयन भी न बोलें
मौन में मन 
पीर भरी गठरी
किधर जाएँ खोलें 

5
वैरी सावन
रिमझिम सा बरसे
मनवा न सरसे
चौबारे खड़ी
बिछे पथ नयना
विरहन तरसे ।
6
कोकिल आए
मधु सुरीले सुर
धुन कोई सुनाए
बगिया झूमे
हिंडोले पवन के
मोरे पी घर आए
    7
चलो भुला दें
चुभने लगें जब,
इस जग की बातें;
चलो बसा लें
इक नयी दुनिया
भरें सुख- सौगातें



हाइकु - 

  1
धरा ने ओढ़ी
फूलों कढ़ी ओढ़नी
 आया फागुन ।

2
 पाखी -सा मन
 सावन का मौसम
 उड़ता फिरे 


3
 शीतल रेत
 चाँदनी की किरणें
 तेरा आभास 

4
मन की बात
अधर चुपचाप  
अखियाँ कहें 

5
रेत में सीप
बचपन के मीत
मोती -सी प्रीत 
6
प्राची में भोर
किरणों की लड़ियाँ
सिंदूरी छोर 
7
अँधेरी रात
विरहन की आँखें
दूर प्रभात 

8
धूप के पाँव
गगन की गलियाँ
छुपी है छाँव ।


9
भोर के गीत
किरणों की झाँझर
चिडियाँ सुने ।
10
हौले मुस्काए ,
झरोखे  खड़ी भोर-
‘चाय हो जाए।’




महिया
1
दिन आस -निरास भरे
धीरज रख रे मन
सपने विश्वास  भरे

2
सूरज फिर आएगा
बादल छँटने दो
वो फिर मुस्काएगा

3
हर दिवस  सुहाना है
जीवन उत्सव- सा
हँस -हँस के मनाना है

4
दुर्बल मन धीर धरो
सुख फिर लौटेंगे
इस पल की पीर हरो

5
बस आगे बढ़ना है
बाधा आन  खड़ी
साहस से लड़ना है

6
थामो  ये  हाथ कभी
राहें लम्बी हैं 
क्या दोगे साथ कभी

7
फिर भोर खड़ी द्वारे
वन्दनवार सजे
क्यों बैठे मन हारे

8
नदिया की धारा है
थामों पतवारें
उस पार किनारा है

9
हाथों की रेखा है
खींची विधना ने
वो कल अनदेखा है

10
दिन कैसा निखरा है
अम्बर की गलियाँ
सोना -सा बिखरा है
चोका

दुःख का घड़ा
उड़ेल दिया मैंने
दबा दिया था
आंगन के कोने में
रोप दिए थे
गीली माटी में बीज
चिर सुख के
अंकुरित हो गए
खिले थे फूल
अब जीवन क्यारी
पुष्पित मुस्कान सी |


  

न सुख - दुःख
ना ही इच्छा अनिच्छा
न आस कोई
ना ही पीर निरासा
न मैं जोगन
न कोई वैरागन
चलती रही
अनजान डगर
कोई विश्वास
चिर परिचित सा
सदा था संग
कि तुम भी तो कहीं
इसी पथ पे
चल रहे हो शायद 
अनंत की खोज में |

शशि पाधा , ३१ अगस्त २०१२



1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही सुन्दर भावाभिव्यक्ति और शब्द संयोजन भावना को दर्शाती और लक्ष्य प्राप्त करती कविता।
    बधाई हो।

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