शनिवार, 8 सितंबर 2012

     अनामिका

नील गगन की नील मणि सी
ऊषा की अरुणाई सी
संध्या के श्यामल आंचल सी
सावन की पुरवाई सी
दर्पण देख सके रूप
थोड़ी छाया थोड़ी धूप

मेरी तो पहचान यही है
और मेरा कोई नाम नहीं है

रेखाओ से घिरी नहीं मैं
कोई सीमा कोई बाधा
आकारों में बंधी नहीं मैं
सूर्य -चाँद यूँ आधा -आधा

खुशबू के संग उड़ती फिरती
कोई मुझको रोक पाए
नदिया की धारा संग बहती
कोई मुझको बाँध पाए

जहाँ चलूँ मैं , पंथ वही है
मेरी तो पहचान यही है
और मेरा कोई नाम नहीं है  

नीले अम्बर के आँगन में
पंख बिना उड जाऊं मैं
इन्द्र धनु की बाँध के डोरी
बदली में मिल जाऊँ मैं

पवन जो छेड़े राग रागिनी
मन के तार बजाऊँ मैं
मन की भाषा पढ़ ले कोई
नि:स्वर गीत सुनाऊँ मैं

जो भी गाऊँ राग वही है
थोड़ी सी पहचान यही है।
और मेरा कोई नाम नहीं है
 
पर्वत झरने भाई बाँधव
नदिया बगिया सखि सहेली
दूर क्षितिज है घर की देहरी्
रूप मेरा अनबूझ पहेली

रेत कणों का शीत बिछौना
शशिकिरणों की ओढ़ूँ चादर
चंचल लहरें प्राण सपंदन
विचरण को है गहरा सागर

जहाँ भी जाऊँ नीड़ वही है
बस मेरी पहचान यही है
और मेरा कोई नाम नहीं है


शशि पाधा --कविता संग्रह "मानस मंथन से "












3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...............................

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  2. रूप मेरा अनबूझ पहेली...
    जहाँ भी जाऊँ नीड़ वही है

    बहुत अच्छी रचना, पूरी रचना को गाकर पढ़ने से खुद को रोक नहीं सका। बहुत दिनों बाद कोई नाज़ुक सी ...रहस्य की ओर इंगित करती रचना पढ़ने को मिली। ब्लॉग बुलेटिन को धन्यवाद ..यहाँ तक पहुँचाने के लिये।

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